Aaina Poetry – अब घर से सारे आईने मैंने निकाल – Ghazal Poem

Aaina Poetry – Ghazal Poem

Aaina Poetry

अब घर से सारे आईने मैंने निकाल दिए
तन्हा हूँ तनहा रहू ख्वाहिसे निकाल दिए.
अब घर से…

खिड़की बहुत थे घर में सारे बंद कर लिए
रौशनी से नाता तोड़ ली अँधेरे में बह लिए..
अब घर से…

खामोश घर दीवारे अब खुद को सह लिए
आवाजे दिल की सुनता हूँ बस तसल्ली के लिए..
अब घर से…

अब बक्त यूँ गुजर रहा चंद सांसो के लिए
रुक रुक के धड़कने साथ है
बस एकबार तुझसे मिलने के लिए…

अब घर से सारे आईने मैंने निकाल दिए
तन्हा हूँ तनहा रहू ख्वाहिसे निकाल दिए.
अब घर से…

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