Angel Poem – काश कोई तो फ़रिश्ता आये – Poem on Hope

Angel Poem – Poem on Hope

Angel Poem

ये काश कोई तो फ़रिश्ता आये,
इन आंसुओ के कोई तो मंजिल होता।

दर्द के दोस्त तो नही होते,
ये दिल में लहू के कोई तो रस्ता होता,
मैं सबब तो नही माँगा ये फ़ातिर,
कम से कम दामन मे किसीका साया होता।

ये काश रंजोग़म के कोई दिवार ना होते,
आंसुओ के दिल से कोई तालुकात ना होते,
सर रखता भी तो कहा रखता,
मतलबी ज़माने के चेहरा नही होता।

फरेबी जहाँ के दस्तूर है बहुत,
आग फुर्सत में है अभी जलना है बहुत,
तन्हाई राख में भी निशान रखता है,
कोई किसीपे रोये अब वो आँखे नही होता।

तुमने मुहब्बत कि है कोई इजाजत तो ना ली,
दिल को बहलाया यूँही कोई तिज़ारत कर ली,
ना सोचा के दिल भी बिकता है यहाँ सस्ते मे,
ना समझा गर टूट जाये तो कोई दरबदर नही होता।

अब तो तन्हाई से वादा करता हूँ,
के पत्थर के दिल देना जिसमे हलचल ना हो,
ना टूटे या बिखरे और कोई तूफां का दास्ताँ ना हो,
ऐसे तो पत्थर में कोई भी दाग नही होता।

ये काश कोई तो फ़रिश्ता आये,
इन आंसुओ के कोई तो मंजिल होता।

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