Boat Poem – एक अलबेला नाव मझधार मे – Ghazal Poem

Boat Poem – Ghazal Poem

Boat Poem

एक अलबेला नाव मझधार में,
देख किनारा चुपके रोये…..
बहाव की रुख न समझा था,
अब दूर किनारा चुपके रोये…..
एक अलबेला नाव मझधार में,

कितने शावन गुजरे गिला मन,
कितने अरमां दम तोड़े है,
अब पतझड़ जीवन, सूखे दिल है,
देख पपीहा चुपके रोये…….
एक अलबेला नाव मझधार में,

ये मन पागल फिर क्यों जाने,
कौन सा ख्वाब सोंजोये…
ख्वाब की तस्वीर, किस्मत है दिल,
देख मन ख्वाबो पे रोये…
एक अलबेला नाव मझधार में,

रुत की कौन समझे है,
ये आणि जानी मौसम है…
दिल नादान सीसे की जवानी,
देख पत्थर भी चुपके रोये…….
एक अलबेला नाव मझधार में.

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