Book Poem – खुली किताब हूँ – Ghazal Poem

Book Poem – Ghazal Poem

Book Poem

खुली किताब हूँ
कुछ पन्नो पर यूँ एतबार ना कर
कहानी अब भी बाकी है यार
और कुछ आगे तो पड़।

कुछ रौशनी कम है सच्चाई नही
अँधेरे में झूट कहा सच बोलती है !!
ये रात फीकी पर जाने दे
धुप की सच मीठी होती है…

ना चौकना तुम आइना देख के
ये तुम्हारा सच है
बस सच ही बोल रहा है।

पर्दों की कीमत से हमें क्या लेना
खुली किताब हूँ
अन्दर बाहर सब पड़ लेना।

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