Chand Jami Pe – चाँद को जमीं पर – Poem on Imagination

Chand Jami Pe – Poem on Imagination

Chand Jami Pe

चाँद को जमीं पर बुलाया था हमने,
मेरे खिड़की और छत दिखाया था हमने,
बहुत सारे बाते किया था हमने,
बादलों पे कसके हँसा था हमने।

हम दोनों के ख्याल बरे मिलते है,
हर कुछ अपना लुटाते रहते,
हर कोई खुश रहे यही चाहते रहते।

कुछ चाँद ने अपनी कहानी सुनाया था,
कुछ मैंने अपनी बात बताया था,
वो भी सितारों से दूर रहती है,
मैं भी सितारे आजकल देखता नही।

वो अपने दाग के बारे मे रंजिश नही रखता,
मैं भी दिल के दाग अब मिटाता नही,
उसे कोई गम ना था कोई अधूरेपन का,
मैं भी आइना अब देखता नही।

वो बादलों मे कुछ लम्हे छुपा रखता है,
मैं दीवारों से सब कह देता हूँ।

वो पूछा मुझसे क्यों तू आजकल गुमसुम रहता,
मैं भी तो तन्हा उन बादलों मे भटकता रहता,
मैंने कहा एक तू ही मेरा दोस्त है,
नही तो आजकल कौन किसका है सुनता।

मैं तो हर रात तेरा ही राह देखता हूँ,
ना आये तू तो बस चुप चाप रहता हूँ,
तेरे चांदनी जब छू जाती है मुझको,
कोई अपना भी है एहसास कराती है मुझको।

मैं चांदनी के साये मे चैन भर लेता हूँ,
कुछ ख्वाबों मे सुहाना खो जाता हूँ,
लोग कहते है आजकल तेरे पाओं जमीं पे नही परते,
मेरे छत गबाह है,
किसीने शायद देखा नही हमें आपस मे बाते करते।

चाँद को जमीं पर बुलाया था हमने,
मेरे खिड़की और छत दिखाया था हमने,
बहुत सारे बाते किया था हमने,
बादलों पे कसके हँसा था हमने।

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