Childhood Memories Poem – बचपन में – Poem on Childhood

Childhood Memories Poem – Poem on Childhood

Childhood Memories Poem

कई रंग देखा था बचपन में,
कितने रांगोली बनाये थे बचपन में।

हर रंग चखा मीठी थी सब शहद जैसे,
दोनों हाथ रंगा था बचपन मे।

उन रंगो से कॉपिया भरता था,
कभी सूरज कभी चाँद उन रंगो मे लाता था,
कपड़े तक रंगो से गले मिलती थी,
उनसे तालमेल था बचपन मे।

घर मे दीवारें रंगो से खिलता था,
छत से आँगन तक फैला रहता था,
दिल तक उन रंगो का इंद्रधनुष रहता था,
बरा रंगीन था रंग बचपन में।

ये आसमां ये बरसात के बुँदे,
ये सर्दियों के सबनम छबीले,
ये धुप कि नमकीन एहसास,
हर कुछ रंगा था बचपन मे।

आज चस्मे मे दिन से रात धुंधला है,
हर शाम बरसात के अब नुकीला है,
धुप शरीर पर अब जलता है,
चांदनी दिल मे खंजर चलाता है।

आसमां इंसानी धुएं मे छिप गया है,
जमीं मे सूखे लहू अब काला है,
मन मे रंग नही जहर मिला है,
दीवारे अब सन्नाटे पालती है।

अब तो रंगो के जात होते है,
रंगो पे अलग नाम लिखा रहता है,
चिड़ियों सब डाल पे बैठती,
अब आपस मे ख़ामोशी बांटती है।

सर्दियाँ अब जिस्म बेच ति है,
फूटपाथ मे भूख जगती है,
मायो कि कोख़ सहमी हुयी है,
कौन जन्मेगा कौन जन्मेगी।

अब तूफानों मे हम घर मे दुबके है सब,
कभी मीठी अम्बिया बाहर बुलाती थी,
अब रात ठहरी है दवाई के आँचल मे,
नींद दादी के हाथ छूटा है बचपन मे।

कई रंग देखा था बचपन में,
कितने रांगोली बनाये थे बचपन में।

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