City Life Poem – ना पूछना मुझसे मेरे शहर के बारे Ghazal Poem

City Life Poem – Ghazal Poem

City Life Poem

ना पूछना मुझसे मेरे शहर के बारे दोस्तों,
किस्तों में यादे भुला हूँ,
अब  चेहरे भी याद नेही दोस्तो…

ना पूछना मुझसे मेरे शहर के बारे दोस्तों,
किस्तों में यादे भुला हूँ,
अब  चेहरे भी याद नेही दोस्तो.

उन गलियों में शाम होती अब भी,
आँगन के दिए जलती होगी अब भी,
नरम हाथो की रोटी बनती होगी अब भी,
ना पूछना फिर भी मेरे अपनों के बारे दोस्तों।
ना पूछना मुझसे मेरे शहर के बारे दोस्तों,
किस्तों में यादे भुला हूँ,
अब  चेहरे भी याद नेही दोस्तो.

कुछ धुंद सी है उन सुबह कि गलिओं में,
सड़के मूरति तो होगी अब भी उस शहर कि और,
पर शायद कोई नेही अब उन दफनाये रिस्तों में।

अब तो संदूक में बंद है किस्से पुराने जख्म के,
ना पूछना मुझसे मेरे जख्मो के बारे दोस्तों।

ना पूछना मुझसे मेरे शहर के बारे दोस्तों,
किस्तों में यादे भुला हूँ,
अब  चेहरे भी याद नेही दोस्तो

दिल कों मजाक कहते है लोग कसूर किसका,
एहसानो पर सिला देते है लोग गुनाह किसका,
मैं तो मुजरिम हूँ मेरा क्या है,
ना पूछना मुझसे मेरे गुनाह के बारे दोस्तों।

ना पूछना मुझसे मेरे शहर के बारे दोस्तों,
किस्तों में यादे भुला हूँ,
अब  चेहरे भी याद नेही दोस्तो

बेआबरू दिल था कबके शहर छोरा दोस्तो,
खाली वो दिन थे जबके शहर छोरा दोस्तों,
वादे वास्ते कुछ नेही थे तब अपने,
अब वोही वास्ता ना याद दिलाना दोस्तों।

ना पूछना मुझसे मेरे शहर के बारे दोस्तों
किस्तों में यादे भुला हूँ,
अब  चेहरे भी याद नेही दोस्तो…

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