City Poetry – सुना था कल अख़बारों मे – Poem About City

City Poetry – Poem About City

City Poetry

सुना था कल अख़बारों मे
इस्तिहार छपा था कुछ लफ्ज़ो मे
गुम हुया था कोइ शख़्स भरे बाजार मे
कही मिल जाये ये
ना लौटाना अब इस शहर मे।

मिल गए ये शख्स कही
ना लौटाना इस शहर मे
दामन मे इसके सच के दाग है
चेहरे पर इंसानियत का रंग लगा है
गर मिल जाये कही
ना लौटाना अब इस शहर मे।

दिल की बात बोलता है
हरबार भलाई का जुर्म करता है
जात पात मे फर्क नही रखता
गरीबों के थाली बांट के ख़ाता है
किसीको को भि दिखे ये
ना लौटाना अब इस शहर मे।

झूट बोलता नही सच फैलाता है
सारे शहर के मैले हड़प लेता है
दुष्मनों को अपना रिश्तेदार कहता है
भाईचारे की बीमारी फैलाता है
गर दिख जाये कही ये
ना लौटाना अब इस शहर मे।

मंदिर मस्जिद गिरजा गुरद्वारा
हर जगह आना जाना है इसका
कई रंग के चादर चराता है ये
सब धर्मो कि खिचड़ी बनाता है ये
मिल जाये कही भी ये
ना लौटाना अब इस शहर मे।

लहू को लाल कहता है ये
चमड़े कि रंग से कोई लेना देना नही
उंच नीच कि परबाह नही करता
सामाज मे गहरा धब्बा है ये
गर दिख जाये कही ये किसीसे गले मिलते
ना लौटाना अब इस शहर मे।

प्यार मुहब्बत का ज़हर फैलाता ये
इश्क़ को रब कि रहमत कहताः है ये
हँसते गाते करता शहर परेशाँ
मिठी बोली से तंग करता है
गर दिख जाये कही जमघट मे वो
ना लौटाना अब इस शहर मे।

मिल जाये कही चरा देना शूली
दफन कर देना या जला देना इसको
बड़ा खतरनाक है ये
लोग इसे फ़क़ीर कहते है
मिल जाये कही ये
ना लौटाना अब इस शहर मे।

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