Dushman Poetry – ये दिल भी दुश्मन है यारों – Dil Poem

Dushman Poetry – Dil Poem

Dushman Poetry

ये दिल भी दुश्मन है यारों
बिलकुल गैरों कि तरह
कभी भी साथ नही देता किस्मत कि तरह।

जुबान से निकले हर लफ्ज़ ये नकारे
मनमानी है करती मौसम कि तरह
जायज नही हर वक़्त लेकिन
जिद करती रहती बच्चो कि तरह।

दिल तो नही कोई और शक्सियत है 
मैं सोचता कुछ वो और कुछ करता है
मैं पूरब वो पश्चिम दिशा है
मेरे मंजिल कही वो कही और पहुचता है।

लोग ना जाने मुझे गलत समझे
वो जुर्म करता मुझे मुजरिम समझे
मेरे हर शला वो अनसुना है करता
मर्ज़ी चलाती कोई हुक्म कि तरह।

मेरे हर सच को झूट कहता है
मुझे नासमझ नादाँ कहता है
ये कैसी मुश्किल अब कौन समझाए
ये दुनिया ना माने ए कौन उसे बताये।

हर आग मे खुद को झलसाये
जलता जो में भी कोई उसे कह जाये
पानी के बुलबुले को वो इश्क़ समझ ता है
हर सांख पर वो धड़कन पिरोये।

दर्द मुझे भी और उसे भी होता है
हर बार है टूट ता सीसे कि तरह
ये दिल भी दुश्मन है यारों
बिलकुल गैरों कि तरह।

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