Ghar Poem – एक था घर दिल में लकीरें खिची थी – Hindi Kavita

Ghar Poem – Hindi Kavita

Ghar Poem

एक था घर दिल में लकीरें खिची थी,
एक ही माँ थी एक ही बोली थी।

एक ही सूरज उगती इसपार,
उसपार ढलती थी,
चांदनी दोनों तरफ खिलती रहती थी।

भले अलग थे ख़ुसीया एक सी थी,
वोही मिठास बोली मे दोनों कि थी।

फिर तख्त ने तख्तपोशी दिखायी,
उस माँ के सीने पर खंजर चलायी।

तख्त कि खून सवार था दिल में,
कर दी कोख अलग हुए दो भाई।

बुरी नज़रे परी एकदिन कही उसपार,
ताने बंदूके दिलों पे बोले बोली अलग कर।

कोख के बोली भला अलग क्या करते,
कोई कैसे अपने ही जुबां काट देते।

तख्त को तो ये दिखाई ना दी,
चलादि गोली हर गुहार अनसुना कर दी।

जमीं फिर लाल हुए शहीदों से,
माँ के बोली थे अपनाये वो जां देके।

ये कहानी है उस बंगाल कि,
माँ के टुकड़े हुए थे तख्त के नाम देके।

नाम अलग भले ही कर दी तानाशाही,
माँ के बोली को ना कर सके वो जां तक लेके।

जाग उठे थे सब मिटटी के लाल,
सीना तान खड़े मरे सब मिटटी के लाल।

मरते मरते भी वो माँ कि बोली बोल गए,
उन सहिदों ने जां अपनी कुर्बान कर गए।

आखिर मे तख्त को ये समझ आयी,
ये जां देंगे पर बोली अलग ना हो पायी।

छोड़के जमीं वो भागे थे कायर,
उन बीर सपूतो को करता नमन ये शायर।

उनकी क़ुरबानी एक नयी सूरज लायी,
माँ कि बोली अपनी हो गयी।

वो बोली कोई और नही है बंगाली,
मीठी है इतनी जैसे शहद है पिघली।

ये कहानी अब अमर है इतनी,
ये मेरे बोली बंगला मेरे माँ जितनी।

ये अन्तरास्ट्रिय मात्रीभासा दिवस पर उन अमर सहिदों के नाम मेरा बिनम्र श्रद्धाजलि।

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