Habit Poem – आदत है उसकी – Poem on Human and Nature

Habit Poem – Poem on Human and Nature

Habit Poem

आदत है उसकी,
बार बार टोकना हर बात पर,
और मेरी, ना सुनते हुए सुन लेना.

अब तो आँखों से भी सुन लेता हूँ,
बीस साल हो गए कभी दहलीज़ नहीं लाँघि,
जहन के तह तक घुल चुकी है वो.

सुबह से शाम , शाम से रात,
हर लम्हा हर घडी,
अब तो वो मेरी घडी की सेकंड वाली सुई बन चुकी है,
मजाल है की मिस कर जाऊ,

सच कहो तो,
सुबह की पहली चाय तक फीकी लगती है,
फोटोफ्रेम है ना,
बराँदे तक चल के नहीं आती.

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