Inscrutable Poem – बोधहीन – Humanity Poem in Hindi

Inscrutable Poem – Humanity Poem in Hindi

Inscrutable Poem

मैं तो बोधहीन एक साधारण मनुस्य हूँ,
तू तो संन्यासी है,
तू क्यों स्वर्ग के लिए लालाइत है.

मैं तो जर्जरित हूँ,
लोभ काम क्रोध मोह माया से,
तू तो संन्यासी है,
तू क्यों इस संसार में मोहित है.

मैं ईर्षा अग्नि में जल रहा हूँ,
खुद ही को नाखुनो से नौच रहा हूँ,
तू तो संन्यासी है,
तुझमे क्यों स्वर्णिल रंग चढ़ रहा है.

हे संन्यासी तू मार्गदर्शक है,
इस दलदल से हमें निकालना तुझीको है,
हमें प्रभु के पास ले जाना तुझीको है,
तू भटक मत हमें राह दिखाना तुझीको है.

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