Old Is Gold Poem – चाँद के दाग पुराने अच्छे – Ghazal Poem

Old Is Gold Poem – Ghazal Poem

Old Is Gold Poem

चाँद के दाग पुराने अच्छे,
दिल तू भी बेदाग़ नही है….
खामोश अब ये रात ही अच्छे,
दिल तू क्यों खामोश नही है……
चाँद के दाग पुराने अच्छे….

ये बादल तू क्यों ठहरा है,
कौन है जिसका राह तके है,
क्यों तेरा फासले बड़े है,
वो देख मेरा चाँद अकेला,
मस्ती में झूमे….

आ चल इस चाँद का हो ले,
चाँद के दाग पुराने अच्छे……
चाँद नगीना, तारे महफ़िल है,
रात की माथे की एक बिंदिया है,

ये बादल तू अब घूँघट बन जा,
आ चल इसको छुपालू दिल में,
ये जमाना ख़राब नज़र लग जाये……
चाँद के दाग पुराने अच्छे…

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