River Poem – घर के पास एक नदी के साथ Poem on River in Hindi

River Poem – Poem on River in Hindi

River Poem

शायद उस पार कोई जिंदगी होगा,
यहाँ जमीं सुखी है,
शायद उस पार हरियाली होगा।

यहाँ पर अब साये तक पीछे छूट चुके,
शायद वहा कम से कम एक आइना तो होगा।

यहाँ आसमा जहर से लाल हो चूका,
मिटटी के घर बदनामी में बह चूका,
हाथ में मेहँदी गीले शिकवे में कैद,
अब तो दूर का ढोल भी पुराना हो चूका।

यहाँ सितारें तक पीले पर चुके,
चाँद धुंधला सा मेरे खिड़की तक भूल चुके,
छत पे सन्नाटे धड़कन तक गूंजती है,
कभी चांदनी का सहारा था अब तो भूल चुके।

अब दिल में धुंध सा है धड़कन धुंधला,
क्या पहने अँधेरे में अब,
रौशनी का चेहरा भूल चूका।

यहाँ जहर अब मुफ्त में मिलते है,
शायद उस पार कीमती होगा।

मुहब्बत घर के ताक पर दम तोड़ चुकी,
शायद उस पार अब तक जिन्दा होगा।

यहाँ कब्र पर नीलामी लगती है अब तो,
कई दाम लगाते दीखते है अब तो,
शायद उस पार जिंदगी हँसता होगा।

नदी अब तक सुन रही थी,
मंद ही मंद मुस्कुरा रही थी,
बोली उसपार भी एक तेरे जैसा है,
रोज़ कह जाता बहस सा बात,
हर बात पे तेरे इसपार के जिक्र ही आता।

कुछ अलग कही पे नही है,
धूल दिल में है मैला जमीं नही है,
ख़ुदा के नज़रे फर्क कहा करती,
कुछ इसपार कुछ उसपार भी है।

शायद उस पार कोई जिंदगी होगा,
यहाँ जमीं सुखी है,
शायद उस पार हरियाली होगा।

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