Sawan Poetry – सावन का महिना चार – Ghazal Poem About Love

Sawan Poetry – Ghazal Poem About Love

Sawan Poetry

सावन का महिना चार यहाँ,
आती नही क्यों बार बार यहाँ,
गीली तकिये नींद भिगोये,
सूखे दिल मेरा यार यहाँ,
आती नही क्यों बार बार यहाँ.

सावन का महिना चार यहाँ….
ऐसे तो आँखों में रहती,
जाने ये कौन से बादल सहती,
रिश्ता पुराना लगता है तुझसे,
दिल के छुपे आँखों से कहती,
सावन का महिना चार यहाँ,
आती नही क्यों बार बार यहाँ.

काजल कहके ये जमाना रोके,
मीत ये सावन दर्द है सोखे,
बारिश की बहाना अच्छा लगता है,
फिर से किसीको अब कोई ना टोके…
सावन का महिना चार यहाँ,
आती नही क्यों बार बार यहाँ.

सावन का महिना चार यहाँ,
आती नही क्यों बार बार यहाँ,
गीली तकिये नींद भिगोये,
सूखे दिल मेरा यार यहाँ…
सावन का महिना चार यहाँ,
आती नही क्यों बार बार यहाँ.

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