Sham Poetry – मेरे छत के चबूतरे से – Poem on Beauty

Sham Poetry – Poem on Beauty

Sham Poetry

मेरे छत के चबूतरे से शाम को ढलते देखना
मेरे यादों के झोरोंके में एक चाँद को खिलते देखना
तुम्हे तन्हाई के थपेड़ों से डर लगता है अगर
मेरे जिस्म के इर्द गिर्द लिपटी उसकी परछाई देखना।

कितनी गर्माहट होती है अब भी उस गुलाबी सूरज में
कितनी नर्म होती है वो पुरवाई के प्यारी चुभन
तुम्हे गम है अगर के जिंदगी कि हमसफ़र नही
तुम मेरे चबूतरे से शाम को लौटते हुए उन परिंदों को देखना।

जिंदगी फर्स पर परी कोई गलीचा तो नही
दिल में मैल नही रखना यादों के खजाना है
कुछ एक बरसात ऐसी भी होती है कई बार
कभी अपने आँगन के रिमझिम मस्ती में भीग के देखना।

कभी चांदनी में इस जिस्म को भिगोके देखना
कभी किसी चांदरात में उन मीठी यादों में डुबके देखना
सितारें झूमते है गाते है सुरों से सरगम सजाते है
कभी तो तुम भी इन जुग्नुयों के साथ कुछ कदमे मिलाके देखना।

मेरे छत के चबूतरे से शाम को ढलते देखना
मेरे यादों के झोरोंके में एक चाँद को खिलते देखना
तुम्हे तन्हाई के थपेड़ों से डर लगता है अगर
मेरे जिस्म के इर्द गिर्द लिपटी उसकी परछाई देखना।

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