Shehar Poetry – मेरे शहर का कोई नाम था कभी – Poem on City

Shehar Poetry – Poem on City

Shehar Poetry

मेरे शहर का कोई नाम था कभी,
ईट पत्थरो में कही अब खो गया।

मेरे शहर में दिल की काम था कभी,
उचे मंजिलो में कही अब नीलाम  हो गया।

कभी खिड़कियाँ यहाँ आसमां लाती  थी,
आज धुप भी हमें अजनबी कहते है।

मेरे शहर में कभी लोग रहते थे,
आज दीखते नही रेत की समय पर।

मेरे शहर में घर में आँगन थे कई,
आज आशियाँ की नसीब चार दीवारों में कही।

मेरे शहर का कोई नाम था कभी,
ईट पत्थरो में कही अब खो गया।

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