Shisha Poem – शीशे की शहर, शीशा दिल – Ghazal Poem Love

Shisha Poem – Ghazal Poem Love

Shisha Poem

शीशे की शहर, शीशा दिल है,
पत्थर से डरे लोग रहते है,
ये गुस्ताख दिल पर न माने,
फिर से मुहब्बत कर जाये…..
शीशे की शहर, शीशा दिल है……..

नफरत के शहर, जहर उगले है,
जहर से चुभे मंजर रहता है,
नादाँ ये दिल है क्या जाने,
हरबार ये जहर पि लेते है…..
शीशे की शहर, शीशा दिल है……..

आग लगे है चारों तरफ,
जिस्म ये झुलसा सदियों तलक,
हम दिल के जले फिर भी न माने,
ये आग ही गले लगते है.
शीशे की शहर, शीशा दिल है……..

शीशे की शहर, शीशा दिल है,
पत्थर से डरे लोग रहते है,
जितना भी मारो सह लेंगे,
हम उनसे मुहब्बत जो करते है….
शीशे की शहर, शीशा दिल है…….

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