Squealing Poem – कभी किलकारिओं – Poem on Childhood

Squealing Poem – Poem on Childhood

Squealing Poem

कभी किलकारिओं के बिच रह के देखो
उनकी कुछ अलग दुनिया होती है।

उस दुनिया मे हॅसी क़े अलावा
ख्वाबो की गुड़िया नाचती गाती है।

कभी उनके गुट मे शामिल हो जाना
ये आसमां कदमों के निचे रहती है।

आईने तक घबराते उनसे
क्यूंकि सच्चाई कि जलेबी नही होती है।

उनके झूट की मासूमियत ना परखना
वो पक्के सोना को सूरज दिखाती है।

कभी उनके गीले शिकवे भी देखना
रंजिश नही होता वो दुशमनी भी शहद होती है।

उनके यादों मे दादी नानी ही मिलते
उसमे परियाँ आसमां बुनती है।

उनके झगड़े ज़हर नही पालती
पल भर के बादल बरसात होती है।

उन नन्हे हाथों मे खंजर नही होते
उनके पीछे दीवारें ना रोती है।

आँखों मे उनके अनगिनत रंग है
कई इंद्रधनुष बस ऐसे ही खिलते है।

उनके दिल कि गहराई ना पूछना
उनमे ख़ुदा क़े घर भी रमता है।

कभी किलकारिओं के बिच रह के देखो
उनकी कुछ अलग दुनिया होती है।

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