Tag: Angry Poetry

Anger Poem और कितने कत्ल के गबाह मांगोगे – Poem on Anger

Anger Poem – Poem on Anger Anger Poem और कितने कत्ल के गबाह मांगोगे जमी गीली है महसूस तो करो माना रंगो में तुम्हारे बहस बहुत है पर बेजान आँखों में सच्चाई तो देख सकते हो ! कब मानोगे जब नदियों में अपनों कि लहू नाचेगी कब समझोगे जब हर जले कि धुया तुम्हारे आँखे

Naraz Poetry – मैं नाराज़ हूँ – Poem on Anger in Hindi

Naraz Poetry – Poem on Anger in Hindi Naraz Poetry मैं नाराज़ हूँ पर तुझसे नही मैं जुड़ा हूँ पर खुदसे नही। क़सीदे कसते है आते जाते हर कोई पूछा हाल हर किसीसे पर मुझसे नही गलीज़ कहते है मुझे मुहब्बत से डरने वाले सबको कहते है मेरे बारे में शहर मरते तो वो भी

Action Poem – आज़ादी – Freedom Poem

Action Poem – Freedom Poem Action Poem जिनको आजादी चार बजे उठ दाता-गां करने की है, जिनको आजादी गली-गली को बूचड़खां करने की है, जिनको आजादी सड़कों पर बेहूदा जाम लगाने की, जिनको आजादी सरकारी सम्पति पर भी मनमानी की, उनको भी यदि भय लगता हो तो फ़िर उपचार ज़रूरी है, अब तो गद्दारो की

What Poem – राम रहीमी तंजीमें – Poem on Anger in Hindi

What Poem – Poem on Anger in Hindi What Poem राम रहीमी तंजीमें पढ़ने वालों का क्या, कर्नल जी पर भी साजिश गढ़ने वालों का क्या? प्रज्ञा जी भी आखिकर साबित निर्दोष हुईं, ऐसे कितने बली भेंट चढ़ने वालों का क्या? तीन तलाक बैन कर डाला अच्छा निर्णय है, किंतु हलाला से काला करने वालों

Border Poem – सरहद पर आतंक मचा है – Poem on Anger

Border Poem – Poem on Anger Border Poem सरहद पर आतंक मचा है लाशें बिछी जवानों कीं, चीखें गूँज रहीं हैं फाँसी खाते हुए किसानों कीं, शहर शहर में हालत बुरी हुई है अनुसंधानों की, और सियासत कर्जदार है सेठों के एहसानों की, लीपापोती, बड़बोलापन हावी हुआ विनाश पर, लो मैं थूक रहा हूँ ऐसे

Deshdrohi – माना हत्या अनुचित है – Spleen Poem

Deshdrohi – Spleen Poem Deshdrohi माना हत्या अनुचित है पर क्यों इतना शोक मनाते हो, हे अंधविरोधी तुम कर्मों से ही नंगे हो जाते हो, ऐसे लोगों को फिक्र हुई जो बंटवारे पे तुले हुए, इनके दरवाजे अफजल-आकाओं की खातिर खुले हुए, इन सबके मुँह से राष्ट्र के शत्रुओं के लिए वकालत है, देखो इन

Poetry – जो खुद को रवि समझ रहे – Poetry Business

Poetry – Poetry Business Poetry जो खुद को रवि समझ रहे थे वो जुगनू से पीछे निकले जो साहित्यिक शीश बने थे वो पैरों के नीचे निकले सबको दर्पण बेंच रहे थे खुद ही आँखें मींचे निकले संस्कृतियों की मिली विरासत उसका करते बंटाधार ये कविता के ठेकेदार, ये कविता के ठेकेदार बॉलीवुड भी पीछे

History Poems – अम्बर में आग लगी होती – Poem on Anger

History Poems – Poem on Anger History Poems अम्बर में आग लगी होती धरती का सीना फट जाता कायरता की बलिवेदी पर अभिमान हिन्द का घट जाता सरिताएँ उल्टी बह जातीं, सब सागर स्वाहा हो जाते उत्तर में सीना तान खड़े हिमवीर शर्म से रो जाते सब निशाचरों ने तमनाशक रवि की क्षमता जाँची होती

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