Tag: Humanity Poetry

Inscrutable Poem – बोधहीन – Humanity Poem in Hindi

Inscrutable Poem – Humanity Poem in Hindi Inscrutable Poem मैं तो बोधहीन एक साधारण मनुस्य हूँ, तू तो संन्यासी है, तू क्यों स्वर्ग के लिए लालाइत है. मैं तो जर्जरित हूँ, लोभ काम क्रोध मोह माया से, तू तो संन्यासी है, तू क्यों इस संसार में मोहित है. मैं ईर्षा अग्नि में जल रहा हूँ,

Say Poem – कभी हिन्दू कहते हो – Ghazal Poem in Hindi

Say Poem – Ghazal Poem in Hindi Say Poem कभी हिन्दू कहते हो, कभी मुसलमान कहते हो, और कभी इंसान को तुम, भगवान कहते हो…..!!!! कहने को तुम आजाद कहते हो, कैद हो तुम फिर भी कहते हो, रंगों की होली रोंगोली कहते हो, और लहू निकले तो, सफ़ेद कहते हो….. भाई को अब दुश्मन

Insaan Poem in Hindi – इंसान एक तरफ खड़ा था – Poem Humanity

Insaan Poem in Hindi – Poem Humanity Insaan Poem in Hindi इंसान एक तरफ खड़ा था ज़मीर पीछे कही पड़ा था इंसान बहुत देर खड़ा था और एक हाथ भी ना बड़ा था। कुछ आँखे बंद पड़ा था अंधेर नगरी सब अँधा खड़ा था किसीने पूछा इंसान क्या आप वहाँ कभी थे ? क्या कोई

Hindi Poem on Humanity – आदमी-आदमी से हो डरता – Hindi Poem

Hindi Poem on Humanity – Hindi Poem Hindi Poem on Humanity आदमी-आदमी से हो डरता जहाँ, नींव इंसानियत की क्या रखी जाएगी? बातों-बातों में होता हो दंगा जहाँ, प्यार की बात किसको समझ आएगी? जब राष्ट्र का सत्ता चोरों को, जाएगी सौंप, तो, राष्ट्र की उन्नति कैसे हो पाएगी? गर अमीरों घर यूँ ही बनता

Humanity Poem in Hindi – कोई इन्साँ क्या होता – Poem About Humanity

Humanity Poem in Hindi – Poem About Humanity Humanity Poem तुम्ही मेहरबाँ हो ना सके, तो वक़्त मेहरबाँ क्या होता तन्हा तन्हा साथ चले हम, अपना कारवाँ क्या होता गुलशन की कुछ शाख गुलों से अक्सर ही महरूम रहीं काँटे बो कर दामन में, फिर कोई बागबाँ क्या होता बिन पतवार के टूटी कश्ती, झोंक दिया

Human Life Poem – समझदारी इसी में है – Poem Being Human

Human Life Poem – Poem About Being Human Human Life Poem समझदारी इसी में है कि मैं अपनी गलती मान जाऊं और उस के बाद इस भूल को फिर न दोहराऊं।। भलाई इसी में है कि मेरे हिस्से की सज़ाएं मेरे हक में ही रहें, किसी मासूम पर अब और दिक्कतें न आनी पाएं।। अच्छा

Humanity Short Poem – जब चाँद का ही कोई मजहब नहीं है

Humanity Short Poem Humanity जब चाँद का ही कोई मजहब नहीं है तो इंसां क्यूँ लड़ता है म़जहब के लिए वही चाँद ईद का है वही चाँद करवा चौथका है फिर इंसान क्यूँ मचलता है मज़हब के लिए

Human Nature Poem – क्यों लोग इतने अन्धे है- Humanity in Hindi

Human Nature Poem – Humanity Poetry in Hindi Human Nature Poem सोचता हूं मैं बार- बार, क्यों लोग इतने अन्धे हैं। परख लेते चतुर लोग, इनमें कितने भोले हैँ। भूखे, दरिद्र और स्वार्थी, कितनों के मानव जैसे चोले हैं। अग्यानता के कारण इनके, जीवन का कोई लछय नहीं। लालच देकर इन्हें आज भी, बेशक! ले

Humanity Poem – जो जितने मशहूर हैं – Bad Behavior Poem

Humanity Poem – Bad Behavior Poem Humanity Poem जो जितने मशहूर हैं। देख अपनों से कितने दूर हैं। भूल चुके वो अपनी कहानी। मर गया जैसे आंखो का पानी। छोड दिया देख गांव भी अपना। इनके दर्शन जैसे कोई सपना। ह्रदय का अब काम नहीं है। मानसिक स्तर इतने पर भी वही है। अपनी मस्ती

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