Age Poem – उम्र इक उड़ता हुआ परिंदा है – Life Poem in Hindi

Age Poem – Life Poem in Hindi

Age Poem

उम्र इक उड़ता हुआ परिंदा है,
मुझे ले कर न उड़ जाए कहीं।

मैं तो बस राख का पुतला हूँ,
मुझे आँसू न बहा ले जाए कहीं।

सब्र रखता हूँ, तभी डर लगता है,
कि मंज़िलें ही न रुठ जाए कहीं।

मौत आना तय है, मगर सोचता हूँ,
कि तू जन्नत में भी न मिल जाए कहीं।

एक टुकड़ा जो मेरे ख़्वाबों से आया है,
मेरी तकदीर के आगे न झुक जाए कहीं।

मेरे दिल को ज़रा खंगाल के देखो,
मगर ध्यान से हाथ न जल जाए कहीं।

जो भी पर्दे में है, सब झूठ है जालिम,
कस के रखना ये पर्दा न उड़ जाए कहीं।

किसी भी सख़्श का रहम-ओ-करम रहे,
बस इतना के वो खुदा न बन जाए कहीं।