Believe Poem – मैं नास्तिक नही हूँ – Hindi Poem

Believe Poem – Hindi Poem

Believe Poem

हे परम् पिता
तुम्हारे असीमित साम्राज्य का विस्तार
तुम्हारी महिमा की प्रवंचना
और भय के विधान का गठजोड़ है
उसकी दरबारी प्रवृत्तियों में
अभय दान के आश्वासन और स्तुतियों के मोड़ हैं
तुम्हारी प्रार्थना की पुस्तकों में
हमारा निरीह सुख और हमारी प्रार्थना
तुम्हारी कृपा के आचरण पर टिका है
तुम्हारी महानता का आडम्बर
आतंक, डर, दया और वरदान के
व्याकरण पर टिका है
जब जब तर्क ने सिर उठाकर
तुम्हारे अस्तित्त्व को प्रश्नांकित किया
क्षुब्ध आस्थाओं ने तुम्हें तर्कातीत बनाकर, सवालों को
कोपभाजन के जुमलों से आतंकित किया
तुम्हारा कण कण में व्याप्त सर्वज्ञानी स्वरुप
क्यों करता है परीक्षाओं का ढोंग
लाद कर कष्टों का अम्बार उन कन्धों पर
जो स्वीकार कर तुम्हारी सत्ता
तुम्हारी याचना में लीन हैं.

लेकिन कुत्सित प्रवृत्तियाँ बचकर क्यों तुम्हारी दृष्टि से
निडर, निर्विध्न और निरन्तर, अपने आचरण में तल्लीन हैं
अनुत्तरित रहते प्रश्नों से
आस्थाएं अब खण्डित हो रही हैं
हमारे तर्क तुमको संदिग्ध बनाने लगे हैं
मेरे विश्वास, आत्मविश्वास की नयी कोपलें
मन में उगाने लगे हैं
मेरी आस्था अब स्वयं में है
मैं नास्तिक नही हूँ

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