Fear Poem – उठ बैठती हूँ रोज – Poem on Women in Hindi

Fear Poem – Poem on Women in Hindi

Fear Poem

उठ बैठती हूँ रोज मध्य रात्रि,
उतार फेकती हूं तमाम मुखोटे,
बीन लाती हूँ उस अतीत के सघन
काले स्याह जंगल से,
बीते समय की छाती चीर,
यादों की वो लकड़ियां,
त्याग रंगीन लिबास, ओढ़ लेती हूं,
उस गुजरे लम्हे की दागदार वो काली चादर।

बहते लगता है खारा पानी संग,
बहा ले जाता है गालों तक काजल
फैल जाती है सिंदूरी बिंदी पूरे ललाट पर,
कानों तक पसर जाती है,
वो लाली होठों को कर पार,
निकल पड़ते है नुकीले दाँत “उनकी “तलाश मे,
माँगती है जीभ रक्त चीख चीख के।

तैयार करती हूँ बड़ा सा हवन कुंड
अपने मस्तिष्क की मजबूत दीवारों का।
प्रगटाती हूँ अग्नि, अपने हृदय में,
दबी अग्नि जिसकी लपटे हर,
रोज सुलगाती है मेरी देह के,
हर एक उस अंग को जिस तक,
पहुँचे थे वो लिजलिजे हाथ।

डालती हूँ एक एक कर क्रोध की वो लकड़ियाँ,
नही सुलगती वो, गीली है आज भी पीर के उस निरंतर बहते घाव से,
रिस पड़ती है उनसे, एक एक खरोच।
एक नही चार थे वो।

देती हूँ आहुति पहले उनके हाथो की जिससेे पकड़ खीच ले गए थे।
डालती हूँ वो दुपट्टा जो ओढा था, लाज बचाने को बाँधे थे उससे ही हाथ ।
फिर उसकी बेल्ट जिसने जकड़े थे पाव,
उनकी उंगलियां न जाने कहाँ कहाँ फिरी थी,
मँडराने लगा था गिद्ध का झुंड,
आ पहुँचे थे कौवे भी बिना निमंत्रण,
बचा खुचा माँस नोंचने खसोटने को।

स्वाहा स्वाहा के जोर जोर से उच्चारण के साथ,
बजाती हूँ रणभेरी एक एक कर के उनकी आँखें,
जो आज भी पीछा करती है कही बाजार में,
कही गली के नुक्कड़, कही छत पर,
डालती हूँ उन्हें भी उन लपटों में,
घिनोने उनके चेहरे, होठ, पीले दाँत
घृणा के खप्पर से खच्च खच्च काटती जलाती जाती हूँ।

अजीबोगरीब आकृति बनती है,
उस उठते धुँए से, चार चेहरे,
अठ्ठाहस करते हुए लद जाते है कंधों पर वेताल की तरह,
घसीटती हुई, फेक आती हूँ उन्हें घृणा की तेजाब भरीे गहरी खाई में,

पाट देती हूँ, फिर उसे उस हवन की राख से,
मलती हूँ उस राख को पूरे बदन पर और जीत की खुशी
में करती ही बेताला तांडव।

थक के पड़ी रहती हूँ घण्टों,
सुबह उठ ओढ़ लेती हूं वही पुराना मुखोटा,
और चल पड़ती हूँ एक सफल अभिनेत्री
की भांति संसार के मंच पे।

सब कुछ हो जैसे सामान्य,
एक अकस्मात के बाद।