First Love Poem – देखती हूँ अक्सर – Hindi Poem on Love

First Love Poem – Hindi Poem on Love

First Love Poem

देखती हूँ अक्सर,
लोगो के मन में कसक,
अपने उस पहले प्यार की,
हो जाता था वो भी उदास,
अनमना, निराश याद कर,
वो अपना पहला प्यार।

न समझ पाई कभी मैं,
पहले प्यार का ये फलसफा,
प्यार तो प्यार है, न बाट पाई इसे,
न दर्जे मैं, श्रेणी मैं कभी।

नही बांध पाई इसे किसी खास,
परिभाषा, लिंग और जाति में,
न बांध पाया होगा कोई।
समय, परिस्थिति और आवस्यकता के अनुसार,
न जाने कितनी ही बार हुआ मुझे ये प्यार।

कुछ सीमित अंतराल के बाद,
हर बार बदला इसने अपना,
रूप रंग और आकार।
स्थाई कभी जो पाया,
वो था सिर्फ और सिर्फ माँ का प्यार।
जिसे खोने की टीस,
आज भी बड़ी तेज उठती है हर बार।

इस उम्र में भी बस यही एक,
सपना देख उठ जाती हूं,
घबरा कर न जाने कितनी ही बार है,
यही कही वो आज भी मेरे आस पास।

ऐसा नही की नही उमड़ता ये,
जब किसी को देखती हूं तड़पते,
टूटते बिखरते तो तत्काल ही,
जुड़ जाती हूं दर्द के उस से,
नही रख पाती लिंग का भेद भाव।

हो कोई पुरुष या महिला,
बढ़ आगे दो कदम,
लगा लेती हूं गले उसे,
नही रहता तब कोई भान,
छू रहा है कोई अंग उससे,
टूट रहा लिंग भेद का विज्ञान।

नही जानती किस दर्जे में बाँटू,
इस प्यार को पहला,दूसरा तीसरा,
या फिर ….प्यार है ही नही।
तो क्या है प्यार?
वो लड़का जब चौथी में थी,
तब आगे की बेंच में बैठता था, वो था?

या वो लड़की जो चौथी, पांचवी से दसवीं तक साथ पढ़ी,
हर कॉपी देती थी,
होमवर्क पूरा करने को,
एक बेंच पे बैठी सालो साथ,
बड़ा प्यार करती थी जिसे,
आज तक फेसबुक पर ढूंढती फिर रही हूँ,
वो कौन से नंबर का प्यार थी।

या वो लड़का, जिसके साथ खेलते खेलते कब बड़ी हुई पता नही चला,
लटटू, क्रिकेट, गुल्ली डंडा, पतंग,
लाल छड़ी, कॉमिक्स न जाने और क्या क्या,
दिन रात खत्म हो जाते पर खेल खत्म नही होता,
तो वो किस नंबर का था।

या भैया, दिल मे बसती बहन,
जिसे चोट लगती तो दर्द,
खुद को महसूस होता या फिर पापा,
ये कौन से नंबर वाला प्यार थे।

अब पति जिनसे सब दुख सुख जुड़े है,
या बच्चे जिनको सफल बनाना,
जीवन का उद्देश्य बन गया वो,
किस नंबर पे आते है।

नही बाबा, बड़ा पेचीदा विषय है,
लो आज भी एक बार फिर,
न समझ पाई इस “उस” पहले वाले प्यार को।


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