Growing Older Poem – देखा है अक्सर खोजते – Poem in Hindi

Growing Older Poem – Poem in Hindi Language

Growing Older Poem

देखा है अक्सर खोजते,तलाशते,
कुछ बीनते, बटोरते और खंगालते,
चालीस, पैतालीस और उसके बाद की स्त्रियों को।

बाजार से फल, सब्जी राशन लाती,
सब के लिये एक पैर पर खड़े नाचती स्त्तियाँ,
खुद को छोड़ सब को तवज्जो देती।
चौक जाती है जब,
जब पीछे से रिक्शा चालक आवाज लगता है,
आंटी जी हटो किनारे चलो।

बहनजी से कब आंटीजी बन जाती।
बंद कमरे में शीशे के सामने,
अपनी कमर और प्रत्येक अंग,
नापती तौलती निहारती,
अब में तब को टटोलती।
ब्लाउज और कुर्ते की सिलाई खोलती,
खुद को उसमे अटाने की कोशिश करती।

कभी झट पुराने एलबम से,
खुद की पुरानी तस्वीर निहारती,
फिर आईने में खुद के चेहरे की लकीरे,
उंगलियों से लिफ्ट करती।

खोए हुए यौवन में, मैं को तलाशती,
तरह तरह की एजिंग क्रीम को,
खुद क बिखरा विश्वास सौंपती,
ये पैतालीस के बाद कि औरते।

कनपटी की सफेदी को मेहंदी,
और भिभिन्न रंग से पाटती,
निस्तेज आंखों के काले घेरे को,
चश्मे की सुंदर फ्रेम से छुपाती।

मोनोपोज की अंतःस्रावी ग्रंथियों के,
बदलाव को गांधारी सी,
मूक लाचार तकती,
बाहर से सामान्य है सबकुछ
ये छलावा भीतर के तूफान से,
लड़ती ये चालीस पैतालीस और उसके बाद की स्त्रियां सचमुच,
भीतर से खोखली, बड़ी अकेली होती है ये।

धुंधले शब्दो को पहले थोड़ी दूर,
फिर आंखों से उनकी दूरी का,
तालमेल बैठाती, फिर नंबर वाले,
ऐनक की बेमन से, लाठी थामती,
आंखों पे चढ़ाती ये,
चालीस पैतालीस और उसके बाद के औरते।

बच्चों को अब पहले सी,
जरूरत कहाँ इनकी,
खुद ही सब करते,
कहाँ इनसे कुछ ये अब पूछा करते,
“रहने दो, आपको नही समझ आएगा”,
की आदत डालती।

बिस्तर पर पीठ कर सोते पति की,
चौड़ी पीठ पर, शादी से अब तक कि कहानी,
अक्षर बअक्षर रात भर पढ़ती,
खुद की उनको अब,
कितनी जरूरत आँकती,
ये चालीस, पैतालीस और उसके बाद की औरते।

मेडिटेशन की सलाह मिलने पर,
भी कहाँ चित लगा पाती है ये,
बच्चों के भविष्य तो कभी,
अपने अतीत और बचपन मे खो जाती।

कभी शब्दो को पकड़ती निचोड़ती कविता कहानियों में,
पिरोती खुद को व्यस्थ रखने की कोशिश मे कभी,
“महादेवी”, “शिवानी”, “अमृता” को याद कर,
टूटा मनोबल आंटे की लेई से चिपकाती,
ये चालीस पैतालीस और उसके बाद की औरते।


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