Happiness Poem – कब मिलती है खुशी तुम्हे – Hindi Poem Love

Happiness Poem – Hindi Poem Love

Happiness Poem

कब मिलती है खुशी तुम्हें,
जानना चाहती हूं तुमसे,
हाँ, होती है परिभाषा अलग अलग सुख और खुशी की।
कुछ विचित्र और विक्षिप्त आदतें है सुख पाने की।

बचपन मे अक्सर गिरने से,
चोट लग जाया करती थी,
हमेशा से घुटने चोटिल, घायल ही रहते है,
उनसे रिसता लहू, उठता दर्द बड़ा आनंद देता था।

जब कभी वो घाव सूख जाता और,
काली खोपट जम जाती,
तो दर्द बंद हो जाता, बस यही तो पसंद नही था वो,
टीस जो नही उठती थी,
नाखून से कुरेद कुरेद फिर,
हरा कर देती उस घाव को,
रिसने लगता फिर से खून,
दर्द तब जा के चैन आता।

बत्ती चली जाती जो कभी तो,
खुश हो जाती, झट मोमबत्ती ले आती उजाले के लिये नही,
पिघल गिरती मोम की बूंदें,
अपनी हथेली के पीछे टपकाने के लिये,
वो जलन बड़ा सुकून जो देती थी,
मोती सी चमकती बूंदों से अलग अलग,
आकृति बनाने में बड़ा मजा आता था।

आज भी कहाँ बदला है कुछ,
बस तरीके और ढंग बदला है।
ढूंढ ही लाती हूँ कही न कही से,
किसी का चीखता कराहता घाव,
चुभाती हूँ खुद को विषबुझे कांटे,
चढ़ने लगता है जब पूरे शरीर में,
नीली पड़ने लगती हूं जब,
डूब जाती हूँ गले तक,
और फिर खीच उसे बाहर निकाल लाती हूँ अपने साथ।

ऐब और लत साथ साथ ही चलती ,
है तमाम उम्र मशान तक।
ऐसा नही कि कोशिश नही की,
बाँधी थी मेड़ ऊँची ऊँची अपने ,
आस पास कि रोक लूँ बहने से खुद को,
कँटीली झाड़ियां भी तो लगाई थी
उस मेड़ के चारों ओर,
और बाँध लिया था मोटी मोटी,
सांकरो से खुद को कस के।

जरा सा मिट्टी का ढेला जो ढहा,
तो बिछा दिया था खुद के स्वाभिमान,
आत्मसम्मान, आत्मा को सैलाब के विरुद्ध,
जैसे “अवंति”, गुरु आज्ञापालन के लिए,
बिछा रहा था स्वयं,
बांध बन उस बाढ़ में,
भीतर स्थित बुद्धि रूपी,
गुरु की आज्ञा मानी तो थी।

कहाँ बस में कर पाया है,
कोई आग को कौन बांध पाया है,
वायु के वेग प्रचंड को।

हाँ, फिर लाँघ, बन्धन सीमाएं,
तथाकथित समाज की,
खुद को खरोचते, चीरते फाड़ते उलझते,
लिपट गई उसी दर्द टीस से,
आदतन खुश हूं फफोले देख।
दहकता और दमकता है चेहरा।
अपने इस कराह और रिसते लहू से।
यही सुख है मेरा और तुम्हारा?


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