Humanity Poem in Hindi – कोई इन्साँ क्या होता – Poem About Humanity

Humanity Poem in Hindi – Poem About Humanity

Humanity Poem

तुम्ही मेहरबाँ हो ना सके, तो वक़्त मेहरबाँ क्या होता
तन्हा तन्हा साथ चले हम, अपना कारवाँ क्या होता
गुलशन की कुछ शाख गुलों से अक्सर ही महरूम रहीं
काँटे बो कर दामन में, फिर कोई बागबाँ क्या होता
बिन पतवार के टूटी कश्ती, झोंक दिया लहरों मे हमने
साहिल किसका सगा हुआ, मॅजधार परेशाँ क्या होता
जीने की उम्मीद जहाँ पर, टूट रही है हर कोशिश में
मुश्किल साथ लिए कंधों पर, जीना आसाँ क्या होता
वक़्त वक़्त का फेर है हमदम, हम भी वक़्त के मारे हैं
दो गज़ ज़मी ना मिल पायी, अपना आसमाँ क्या होता
ख्वाबों के इस दौर में सच का, ग्राहक कोई मिला नहीं
खुद अपने सब ख़ुदा बन गये, कोई इन्साँ क्या होता


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