Inspirational Poem Woman – हॉ, मैं औरत हूँ – Woman Poem

Inspirational Poem Woman – Woman Poem

Inspirational Poem Woman

हॉ, मैं औरत हूँ,
अपना वजूद ढ़ूढती युगों युगों से पहचान ढूढती,
विचलित सी, खुद को तलाशती फिर रही हूं,
मुझे कभी बेटी, बहन, कभी पत्नी तो कभी मॉ का नाम मिला,
न मिल सका तो बस मनुष्य होने की पहचान.

हर रिश्ता मुझसे आदर्श की अपेक्षा रखता है,
सबको मुझमेंआदर्श बहन, बेटी पत्नी या मॉ की तलाश है,
नही देख पाता कोई कि पंच तत्वो से रचित मनुष्य हूँ मैं,
हर स्वभाविक संवेदनाएं,भावनाओं से लिप्त हूँ मै,
हक है मुझे भी मन की कर जाने का..
न कसो हर वक्त सही_गतल की कसौटी पर मेरे आचरण को,
हॉ मै एक औरत हूँ, मै व्यथित हूँ, मै कलुषित हूँ,
बहुत से प्रश्नों का भूचाल मचा है, इस मस्तिषक मै,
हे प्रभु, क्यो इस देह की एेसी, संरचना की?

पता है, गौरव दिलाना चाहते थे ना? मातृत्व का,
फिर ये अंग ही कारण, क्यो बन गये अपमान का?
क्यो अपमानित, दंडित हुई अहिल्या, क्यो देनी पड़ी सीता को अग्नि परिक्षा,
किसने दिया अधिकार इन्हे?
कौन है जो पति-पत्नि के अधिकार निर्धारित करता है,
किसने दिया निर्णायक बनने का अधिकार उन्हें,
हर बार ही सीता और अहिल्या क्यों?
क्यो नहीं ली गई परीक्षा,
श्री राम, मुनी गौतम के चरित्र की?
वन में अकेले विचरण तो उन्होने भी तो किया..
क्यो आज भी स्त्री होने की सजा मिलती है, नारी को,
न जाने कितनी ही निर्भया बली चढी अब तक, और न जाने कब तक.

क्या था अलग उन बालाओ में,
और उनकी मॉ मे, बहन मे?
वही सारे अंग जिससे उसकी उत्पत्ति हुई,
फिर क्यो इतना वहसी हुआ…
समझ नहीं आती आज भी ये बात,
क्यो दो लोगो के झगड़े मे,
अपशब्द कहे जाते है मॉ_बहन के नाम,
क्यो नही गालियॉ बनतीं बाप और भाई के नाम..
न जाने कौन सा अहम् तृप्त होता है,
स्त्रियो का करके अपमान….
कहते हैं विवाह दो लोगो को जोड़ने पवित्र बंधन है.

तो क्यो जल जाती है बेटियॉ ही हर बार,
बड़ा निपुण बना के भेजी जाती हैं वो ससुराल,
कैसै हो जाती है वहॉ इतनी लापरवाह,
क्यो आग सिर्फ बेटियों को ही पकड़ती है,
बेटो से क्या नहीं है आग को प्यार,
न समझ पाई, कैसै निर्धारित करते हैं लड़कियों का चरित्र वस्त्रों से,
कौन बनाता है, मापदंड का पैमाना,
पुरूषों के मापदंड के पैमाने का निर्माण क्यो नही हुआ अबतक?

लड़कियों से ही क्यों अपेक्षा रखी जाती है, वर्जिनीटी की,
क्यो नहीं पूछता कोई लड़को से ये सवाल…
क्या सारा जिम्मा औरतो ने ले रख्खा है,
समाज को, घर_परिवार को, उचित_अनुचित को, आदर्श को,
त्याग को स्थापित करने का..
तब से अब तक,
आखिर कब तक?
कब होगा बदलाव,
हे ईश्वर, इस नश्वर देह मे,
बुद्धि दी है तो तर्क वितर्क भी होगा ,
कई प्रश्न, कई “क्यों” उभरेगे हीं….
कल भी, आज भी और न जाने कब तक ढूढ़ती रहूँगी
इन प्रश्नों के जवाब,
हॉ, मै एक औरत हूं.
विचलित हूं, कलुषित हूँ…
सवालो का चक्रव्यूह में…


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