Life Journey Poem – बदस्तूर की है मुकम्मल – Poem Life Journey

Life Journey Poem – Poem Life Journey

Life Journey Poem

बदस्तूर की है मुकम्मल,
सारी रिवायतें ए जिंदगी।
सुन….जरा रुक, थोड़ा सुस्ता,
इतने तेज तू न कदम बढ़ा।
दौड़ ली बहुत साथ तेरे,
अब बस, थोड़ा तू भी तो,
मेरी ताल से ताल मिला।

जिया किए उम्र तमाम,
सबकी ……….खातिर,
गुजारा है हरेक लम्हा,
संवारने सजाने में अपनों को,
कहाँ रही फुर्सत इतनी,
क़ि देखे कभी आइना।

हँसता है मुझपे ही आइना ये मेरा,
देख, कैसी थी तू अब कैसी हुई है।
ये आँखों के नीचे काले घेरे,
ये फीका सा बेजान चेहरा ये,
बालों से झांकती सफेदी,
झाइयां और झुर्रियां भी दिखने लगी अब तो,
थोड़ा झिझकी,थोड़ा घबराई,
फिर घूर के आईने को डपट लगाई।

सुन पगले, मैं औरत हूँ,
पहले बेटी थी तब देखता।
फिर बनी पत्नी,
बहू और अब माँ हूँ,
ये जो दिखा रहा है न दे – दे के ताने,
पूछ जाके उन्हें कि कैसी लगती हूँ मैं।

जिनके लिये ये उम्र गवाई है
ये सब वक़्त के इनाम है।
सिर्फ मैं ही नहीं “माँ” भी ऐसी ही तो थी।
हर घर में जा देख आ,
माँ ऐसी ही होती है।
ये हिंदुस्तान है,यहाँ माँ ,
देखती नहीं है आइना,
बच्चो की आँखों में देख
खुद सजती संवरती है।

देख ध्यान से कितना नूर
है झलकता, गुरुर है चमकता
बच्चो को मिले मुकाम का।
जा तू तो बेजान है,
कहाँ समझ पायेगा
फितरत, औरत की
और उसकी कुर्बानी की।