Life Poem – है मकान किराये के – Truth of Life In Hindi

Life Poem – Truth of Life In Hindi

Life Poem

है मकान किराये के
दुकाने भी है किराये की।
जनता सब कोई है ये,
पर मानता नहीं कोई।
सजा रखी है खूब दुकाने,
सँवार रखे है मकान भी।
खुद ही खुद की, बढ़ चढ़ के
बोली लगाता है हर कोई।
होड़ लगी है हर तरफ खुद को,
दूसरो से महँगा और बेहतर,
साबित करने की पल पल,
खुद ही खुद को छलने की,
कोशिशे है बार बार।

न जाने कब,वो मालिक,
मकान खाली का आदेश दे दे,
चलो एक बार, तो झांके कभी,
दूसरो के मकान और दुकान।
कही दरारें भरे, कही छत पाटे,
कही छप्पर छाए,
तो कही रंग रोगन कर आये।
झोपड़ियों को जब सजायेंगे तो,
अपने मकान खुद ब खुद महंगे कहलायेंगे।
चंद रोज की है बसावट,
फिर काहे की हेरा फेरी।
कर ले किसी के लिये
जो थोड़ी मजदूरी,
थोड़ा तो सुकूँ पाएंगे।