Life Struggle Poem – बिकती कहाँ है जिन्दगी – About Life Poem

Life Struggle Poem – About Life Poem

Life Struggle Poem

बिकती कहाँ है जिन्दगी बाजारों में,
चुन लो यही कही,
आस पास के गुलजारो से।
ख्वाइश नही कि छू लू अब तारो को यहाँ,
चल,कदम दो कदम साथ मेरे,
खुद बन जाऊ मैं नीला आसमां।

कहता तो है, न ज़ाया कर आंसुओ को इस तरह,
ढाल ले, इन्हें शब्दो में अपने रच डाल कुछ नया।
सुन, दिया है जो जख्म तूने,
तो दवा, अब तू न बता।
कहाँ ठहरा है, वक्त कभी रोके किसी के।

सरक जायेगी जिंदगी,
हाथों से रेत की मानिंद।
देख, बेरुखी इतनी भी अच्छी नहीं, कहे देती हूँ,
कहते हो, कि पानी हो तुम,
यूँ मुठ्ठी में न समाओगे।
सुन, हौसला तो इतना है,
कि रोक लूँ सैलाब इन बाँहो में।

चल छोड़ तू न ये समझ पायेगा,
ये खुदा की वो नियमत है
सबको नहीं बक्शी जाती।
मेरा क्या है, मै तो कारी बदरिया हूँ,
बरस के निकल जाऊँगी।

मगर तू प्यासा ही रह जायेगा
सावन में, ये सह न पाऊँगी।
गर रुख बदल लिया मैंने,
तो फिर पछताओगे।
डरती हूं तो बस, इस बात से,
बिन तेरे, मैं रहना न सीख लूँ कही।

बहती नदी हूं, उल्टी
न फिर, बह पाऊँगी।
जा किसी औऱ सागर में मिल जाऊँगी।