Plant a Tree Poem – कल की ही तो बात वो – Beauty of Nature

Plant a Tree Poem – Poem on Beauty of Nature

Plant a Tree Poem

कल की ही तो बात वो,
आया था घर मेरे,
हाँ, वही मेरा पुराना मित्र,
जो नही चूकता, एक भी,
जन्मदिन पर आना और,
कुछ अलग सा तोहफा दे जाना।

इस बार सचमुच कुछ,
अलग ले आया था वो,
जानता था मुझे पौधों,
से विशेष प्यार है,
सो ले आया एक बड़े से,
गमले में वो बोनसाई,
इनडोर बोनसाई ,
बेशक सूंदर था वो,
खुशी भी हुई उसे देख।

इस बात तो आज दो दिन हो गए,
नही सो पाई एक भी दिन चैन से,
बड़े डरावने सपने आते है,
उठ जाती हूँ पसीने से तरबतर।

लगा सोते हुए, कोई सुबक रहा है,
हिचकियां ले ले कर,
बेड रूम से नीचे हॉल में आई,
तो देखा वो आवाज सीढ़ी पर,
रखे उस गमले से आ रही थी,
और अचानक उसमे से आँसू,
टपकने लगे जो लाल,
रंग के खून में बदल गए।

घबरा के मैंने बाहर का दरवाजा खोला तो सरकने,
लगा वो मेरी ओर मैं बाहर निकल दौड़ पड़ी,
वो रोता रोता पीछे था।

भागती गई, तब तक गई,
तो पाया खूद को एक अजीब से जंगल मे,
वहां थे चीड़, चनार, देवदार,
बरगद, पीपल, नीम, आम के बड़े बड़े विशाल पेड़,
अचानक से वो एक दम छोटे,
होने लगे, हर तरफ बौने बौने पेड़।

उस बौने बरगद के जड़ो ने,
पकड़ लिये पाँव और खींचने लगा अपनी ओर।
तभी एक बौने से पेड़ से निकल पड़ी घुमावदार टहनियाँ,
बांधने लगी हाथ।

फिर कुछ लोगो का शोर सुनाई दिया,
मुड़ के देखा तो रंग बिरंगे,
कपड़ो में तमाम आदमी औरत,
मेरी ओर चले आ रहे है ,
उनके शोर को सुन छोड़ दिया उन पेड़ो ने।

छोटे छोटे हाथ-पैर,
किन्तु हथेली और पंजे चौड़े,
चेहरे और सिर का आकार वही,
बड़ा और चौड़ा, नाक पसरी सी,
दांत पीले पीले और चौड़े,
छोटे छोटे कदम से झूमती,
घसीटती सी सरपट चाल।

जोर जोर से हँसते हाथ बढ़ाये,
मेरी ओर बढ़ते चले आ रहे हो,
उनसे भयभीत हो लगभग भागना,
चाह रही थी किन्तु एकदम से,
कदम वहीं जम गए और मेरा आकार,
भी उनसा ही हो गया,
और उनके साथ उनकी ही,
दौड़ में शामिल हो दिशाहीन,
भाग रही थी, जैसे किसी युद्ध को,
जा रहे हो सभी, अजीबोगरीब हथियार लिये।

आँखों में मोटी मोटी आँसू की बूंदे,
हाथ मे छोटे छोटे जूते,
छोटे छोटे कपड़े,
छोटी कुर्सियां, मेज,
ढोल, नगाड़े और न जाने क्या क्या।
नजर आसमान पे,
सारी चीजे ईश्वर को दिखाते हुए,
पूछते जाते थे इस सजा की रजा।

तभी अलार्म जोर से बज उठता है,
खुल जाती है नींद तभी,
जान में जान आई कि ये,
सिर्फ औरसिर्फ सपन था।

सुबह उठ सबसे पहले उस,
बोनसाई पौधे का गमला उठा,
कमरे से बाहर रखा उसे,
धूप और खुली हवा मे।

फिर फोन लगाया कृषि अनुसंधान,
विभाग में और कहा, क्या दुबारा,
उसे उसका पहले वाला रूप दे,
सकते हो जिसे अपनी जरूरतों,
और मनोरंजन के लिये छीना है,
वहां से जवाब मिला” नही,
“ऐसी कोई तकनीक विकसित नही की।

तब कहावत याद आई “टीट फ़ॉर टेट”।
कभी मनुष्य खेलता है प्रकृति से,
कभी खेल जाती है,
प्रकृति मनुष्य से।


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