Bharat Mata Poem – भारत माता – Hindi Poem on Bharat Desh

Bharat Mata Poem – Hindi Poem on Bharat Desh

Bharat Mata Poem

मैने एक दुःसवप्न देखा! भारत माता का आँचल जलता देखा!
घिरी थी आग की लपटों मे, खडे थे तमाशबीन चौबारे में!
अपनी निर्लजता, वहशीपन, कट्टरता लिये आखों मे,
सर्द हवाओं में!
भिगीं आँखे, नतमस्तक थी, अविरल अस्रुधार बही
अपनी संतानों के आगे बेबस और लाचार खड़ी!!
शस्य धरा की निर्मल धारा कुपित हो विकराल हुई!
बेवस माता के चरणों में अपना अस्तितव त्याग चली!
हाय रे! मानव क्या हो गया? अपनी मानवता भूल गया!

असहिष्णुता का खेल रचा कर अपना घर विच्छेद किया!!
जात-पात के झगडे में भारत माता को भूल गया!
जिस थाली में खाया, उसी में तूने छेद किया!
राम -रहीम के बेटों ने माँ का ह्रदय वेध दिया
बिष का प्याला को भी माँ ने अमृत धरा बना डाला!
पल पल प्रतिपल जल रही थी आस लिये इन आँखों में!
सुबह का भूला घर लौटेगा, इस आँचल की छाँव में!

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