Diwali Kavita – आज जगत भर के आँगन – Festival Poem

Diwali Kavita – Poem on Deepawali in Hindi

Diwali Kavita

आज जगत भर के आँगन में कुछ ऐसे दीप जलाएंगे,
बस्ती बस्ती झूम उठेगी, बच्चे भी खुश हो जाएंगे।।

आँगन आँगन फूल खिलेंगे, घर घर में उजियाला होगा,
अब की बार पटाखों पर नहीं ग़मों पर आग लगाएंगे।।

दीप जलाते वक्त ही मन को भी रोशन कर लेना,
कि अधर्म को भूल भाल कर हम धर्म को अपनाएंगे।।

ख़ूब मिठाई, खूब खिलौने, खूब धमाचौकड़ी होगी,
आज के दिन तो बूढ़े भी फिर से बच्चे हो जाएंगे।।

“सहर” की तरफ से यही कामना, यही दुआएं रहती हैं,
कि इस दिन के जैसे ही सब के हर दिन रोशन हो जाएंगे।।

आज जगत भर के आँगन में कुछ ऐसे दीप जलाएंगे,
बस्ती बस्ती झूम उठेगी, बच्चे भी खुश हो जाएंगे।।

आँगन आँगन फूल खिलेंगे, घर घर में उजियाला होगा,
अब की बार पटाखों पर नहीं ग़मों पर आग लगाएंगे।।

दीप जलाते वक्त ही मन को भी रोशन कर लेना,
कि अधर्म को भूल भाल कर हम धर्म को अपनाएंगे।।

ख़ूब मिठाई, खूब खिलौने, खूब धमाचौकड़ी होगी,
आज के दिन तो बूढ़े भी फिर से बच्चे हो जाएंगे।।

“सहर” की तरफ से यही कामना, यही दुआएं रहती हैं,
कि इस दिन के जैसे ही सब के हर दिन रोशन हो जाएंगे।।