Festival Poem in Hindi – Poem on Deepawali in Hindi

Festival Poem in Hindi – Poem on Deepawali in Hindi

Festival Poem

जला डाला उसको! हाँ, उसीको,
जिसकी बहन सुर्पनखा,
लक्ष्मण को रिझा न सकी,
नाक कटवाकर लौटी थी,
ललकारी थी भाई के मर्दानगी को,
और फिर ……………
और फिर,
नारी का अपमान का बदला,
नारी को अपमानित कर लेने,
पहुँच गया था जो सीता के पास,
दिखा दिया स्वर्ण-मृग सीता को,
हो गए राम सीता के हठ में बहार,
साधू के भेष में अब वह आया,
पार करते हीं लक्ष्मण रेखा,
सीता को हरण कर लाया,
अपने राजप्रसाद में,
नहीं मिली थी सहमति,
सीता से,
उसे छूने को,
और नारी अस्मिता का ख्याल,
रखा था उसने भी राम को भी विश्वास नहीं था,
उस दुष्ट पर या फिर उस नारी पर,
अग्नि परीक्षा देना पड़ा था,
सीता को पवित्रता सिद्ध करने,
पाक साफ साबित हुई थी वह।

जला डाला तो उसको!
पर, उसका क्या करोगे?
जिसकी बहनें खुलेआम घुमती हैं,
भेड़ियों के बीच शिकार होती हैं,
आबरू लुटती है,
नोंच लिए जाते है मांस,
उनका क्या करोगे?
जिनकी औरतें को,
नित दिखती है स्वर्ण-मृग,
लक्ष्मण रेखा को लांघ ख़ुद हीं जाती हैं,
आशा राम या राम रहीम सरीखे,
दरिंदो के पास,
जागो! पहचानो!
अपने अंदर छुपे रावणों को,
भस्म कर डालो इसे,
और फिर मनाओ विजयदशमी त्योहार।