Human Nature Poem – क्या जानना नहीं चाहोगे – Hindi Kavita

Human Nature Poem – Poem on Human and Nature

Human Nature Poem

क्या जानना
नहीं चाहोगे?
मैं कहाँ,
किस हाल में हूँ,
जीवित भी हूँ
या फिर
मर-खप गई हूँ।
शायद तुम नहीं
जानना चाहोगे।
तुम तो पुरुष
रूप में जन्म पाकर
लिप्त हो
मौके-बेमौके अपनी
पौरुषता के एकाकी
स्वांग रचने में।
ओ पुरुष,
मगर तुम याद रखना
तुम्हारा यह आचरण
तुम्हारी विजय
का प्रतीक नहीं है
क्योंकि इच्छित
जीवन जीने की
इस चाह के चलते
एक दिन तुम
हार जाओगे अपना सर्वस्व

इसके विपरीत मैं,
आरोपित जीवन
पाकर भी
कभी हारी
न कहलाऊंगी।
जानते हो क्यों?
मैं नारी हूँ,
जब-जब
करती हूँ मैं प्रेम
निश्चल, निःस्वार्थ
प्रेम ही करती हूँ
कर अपना सर्वस्व अर्पित
तुम्हें करती हूँ
उच्च पद पर आसीन,
असहनीय पीड़ा सहकर
बढ़ाती हूँ तुम्हारी
वंश-बेल
खुद स्वयं को
खोकर
देती हूँ पूर्णता
तुम्हारे अस्तित्व को।
इसके सर्वथा विपरीत तुम!
मेरे ईश्वर तुल्य
प्रेम में भी
देखते हो केवल
अपनी दैहिक संतुष्टि!

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