Life Experience Poem – Poem About Experience in Life

Life Experience Poem – Life Poetry

Life Experience Poem

मैने अब रहनुमाई सीख ली है,
अपने जख्मो की तुरपाई सीख ली है,
जब ग़म है मेरा,तो कोई और क्यों हो रहनुमा।
ले आई हूँ, एक नफ़रत का डोरा,
और गुस्से की माटी,
नहीं रिसने देती हूं अब,दर्द इनसे,
बाँध देती हूं इनपर घृणा की पट्टी।

नहीं आने देती,इन आँखों में बेबसी के आँसू,
पोंछ देती हूं इन्हें,बेरहमी के रुमाल से,
निकाल फेका जो धड़कता था बार बार, लगातार मेरे भीतर,
कम्बख्त कमजोर बनाता था,
रख ली है चट्टान उस जगह
नहीं करता अब ये शोर कोई भी।

देखो अब फिर से उठ खड़ी हुई, झाड़ फेकी यादो की धूल।
पीने लगी हूँ आग अब पानी की जगह,
जुबान ने अब गरमाई सीख ली है।
अब खुद ही,पीर हूँ, खुद ही फ़क़ीर हूँ, खुद ही खुदा हूँ,
खुद ही रहनुमा हूँ,
खुद ही खुद को देती हूं जख्म,
क्योंकि अब मैंने रहनुमाई सीख ली है,
जख्मो की तुरपाई सीख ली है।

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