Loneliness Poem – ढूंढती रही हर दम – Loneliness Poem Hindi

Loneliness Poem – Life Poetry

Loneliness Poem

ढूंढती रही हर दम
करती रही यही प्रयास,
बुझी नहीं, अब तक.
तुझे पाने की प्यास.
ऐ प्रेम, हाँ तुझसे ही कर रही,
हूँ मै ये बात।
तेरी ही आस में
आने दिया उसे अपने पास,
सुना था, देना ही प्रेम हैं
तो ले, अर्पण कर दिये
उस पर अपने तन-मन प्राण
फिर भी, न पा सकी तुझे,
खेलता रहा, खसोटता रहा,
सब कुछ सहती रही,
आँखों से ये अश्रु धार यूँ बहती रही,
इसलिये नहीं कि सह न सकी उसका ये कठोर स्पर्श।

बल्कि उसके स्पर्श के,
निशानों में भी करती रही,
ऐ प्रेम तेरी ही तलाश,
उसके हर स्पर्श में ढूंढती रही तेरा अस्तित्व,
पर निष्फल ही रहा मेरा,
तुझे पाने का ये प्रयास,
उसके हर तर्क,
हर दलील को करती,
रही मौन हो को कर स्वीकार,
कहता था वो सयाना,
प्रेम का रास्ता, इस देह से होकर ही गुजरता है,
रोज नई नई प्रेम की परिभाषाये लाता और समझाता,
यही चलन है, यही दस्तूर है।

और न जाने क्या क्या,
वो जाता कहता जाता
नहीं था गलत वो,
वही वो समझाता,
जो उस बिचारे को,
समझ में आता,
थी कमी, कही मुझमे ही जो चाह कर भी उसे समझ न पाती,
न जाने उसकी एक भी बात नहीं थी मुझे बहला पाती,
फिर भी तेरी ही खोज में,
मानती रही उसकी हर बात,
तब से अब तक,
और न जाने कब तक तकती रहूँगी तेरी राह।

अपनी दी दलीलों को कारगर कर जब वह वो, सो जाता है,
मैं पगली, बोझिल, सूजी आँखे लिये,
उसकी हर कोशिश में तुझे ढूँढना चाहती हूँ,
कही न पाके तुझे एक बार फिर हार मैं जाती हूँ,
आज भी मेरे अंदर की राधा को,
मेरे भीतर बसती मीरा को
अपने उस कान्हा का है इन्तजार,
वो जो सचमुच बुझा सके
इस आत्मा की प्यास।
देह तो रह जायेगी यही,
खाक बनकर एक दिन
मुझे तो आत्मा से आत्मा
के मिलन की है, अनबुझी प्यास।

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