Marriage Poem – परिणय – Poem on Marriage in Hindi

Marriage Poem – Poem on Marriage in Hindi

Marriage Poem

ध्येय नहीं परिणय का बस,
तन से तन का मिलन ही हो,
प्रेम प्रगाढ़ होती है जब,
मन से मन का मिलन भी हो|

राह अलग और चाह भिन्न तो,
परिणय सूत्र की उम्र कहाँ?
पल-पल घेरे शक का घेरा,
निर्वहन तब सम्भव कहाँ?

रह-रह कर अहं टकराए,
श्रेष्ट कौन बतलाने को,
जब-जब पेड़ें हैं टकराए,
जला गये हरे वन को|

मैं-मैं की भावों से उठकर,
हम की भाव करो धारण,
दंपति-जीवन तब जाकर,
खुशहाली करे कायम|