Mother Love Poem – शिकायत – Poem on Mother in Hindi

Mother Love Poem – Poem on Mother in Hindi

Mother Love Poem

माँ बहुत बात करनी है तुमसे,
बहुत कुछ भरा है इस मन में
सब कुछ उड़ेल देना चाहती हूँ
सबकुछ तुम्हे बता देना चाहती हूँ,
क्यों नहीं सुनती अब बस थोड़ी देर,
के लिये ही सही आ जाओ नहीं रोकूगी,
वादा रहा तुमसे नहीं तो किस से बताऊँ,
याद हैं मुझे पहले जब स्कूल से आती थी,
तो कितनी बक बक करती थी मैं,
पूरी बात जब तक नही बता लेती थी,
तब तक कहा चैन लेने देती थी तुम्हे,
और तुम भी तो मुस्कुरा के सारी बाते सुनती थी।

और हां जब शाम को खेल के वापस आती थी,
तब भी तो सारी बाते बताती थी,
तब कभी डांटती,कभी समझाती थी ना?
ऐसा नहीं किया करो,बुरा लगेगा दुसरो को
वगैरह वगैरह,सब कुछ याद है मुझे।
तब क्या पता था, जब सचमुच तुमसे शिकायत करनी होगी,
तब तुम सुनने के लिये नहीं रहोगी,
जो बचपन में समझाया, हर बात मानी,
किसी का दिल न दुखे ऐसा व्यवहार नहीं करना,
इज्जत लिहाज, सबकुछ तो समझाया,
चिल्ला के नहीं बोलना,
अपना गुस्सा नहीं जाहिर करना,
प्यार से बात करना।
मानते मानते स्वाभाव ही बन गया ऐसा,
पता ही नहीं चला कि कब अपने लिये जीना छोड़ दिया,
दूसरो के मुताबिक चलने लगी.
हर बात सिखाई.पर ये नही सिखाया कि लिहाज की सीमा क्या होती है,
लिहाज और आत्म सम्मान की बीच एक पतली महीन लकीर है,
इस फर्क की पहचान कक्यो नहीं करवाई।

तुम भूल गई ना ये बताना?
इसमें तुम्हारी भी गलती नहीं है,
जब तक इस फर्क को बताने की उम्र आई मेरी,
तब तक तुम्हे कैंसर हो गया। फिर तो कहा होश ही रहा,
तुम्हे न मुझे, तब ही, बचपन मेरा भी तभी ख़तम हो गया,
इस बीमारी ने पूरे घर को ही छिन्न भिन्न कर दिया,
जिस घर की नींव ही हिल गई हो वो घर भला कैसे टिका रहता?
सब तो बाहर थे, बड़े भैया, दीदी, छोटा भाई, मैं ही थी तुम्हारे पास,
पापा भी कब तक छुट्टी लेते, नोकरी जो थी,
मैं ही ले जाने लगी थी इलाज के लिये।

हर दर्द देखा और महसूस किया है।
हर बार यही लगता था,
तुम तो इतनी पूजा करती थी ना,
बिना पूजा किया कभी कुछ मुह में नहीं डाला फिर भी तुम्हे ही क्यो?
हाँ, बहुत चिन्ता करती थी ना मेरी,
कि तुम्हारे बाद मेरा क्या होगा?
सचमुच जायज थी, चिंता।
माँ थी ना, शायद आभास हो गया था,
इसलिये तो, बस, थोड़ा सा बदतमीज बनाती.

थोड़ा जिद्दी, थोड़ा नकचढ़ा, थोड़ा घमंडी भी,
ये सब ही तो गुण है आजकल,
जो शान से जीने देते है,
इसके बिना तो लड़की बेवकूफ कहलाती है,
नहीं देता इसके बिना कोई इज्जत,
ना,नहीं, no, ये तीन शब्द ही सुख का आधार बने है,
बस ये बोल नहीं पाई कभी, किसी को,
बस ये बोलना आ जाता तो यू,
तुमसे शिकायत न कर रही होती,
अब बस, बहुत हुआ, कहते है ना?
सीखने की कोई उम्र नहीं होती,
लो अब सीख ली ये सारी बाते,
कह दूँगी गुस्से में “ना,नहीं,no,”
आज की सो की अब कभी शिकायत नहीं करूंगी,
लो जीना सीख लिया अबतो, अब हूं मै भी सम्मानित!
इस तथा कथित सभ्य समाज में।

सुनो माँ,
मैं भी हूँ, अब बेटी की माँ,
वो सब शुरू से ही सिखाया,
जिसे सिखाने से चूक गई थी तुम, हां मै वो माँ हूँ
जिसने बदतमीजी भी सिखाई।
आज वो मुझसे शिकायत नहीं करती,
पर माँ आज भी तुम बहुत याद आती हो बस,
अब तुमसे मिलना चाहती हूँ
अभी भी बहुत अनकही है,
जो सिर्फ तुमसे ही कहना चाहती हूँ,
सच कहूँ तो माँ आजभी मैं सिर्फ और सिर्फ तुमसा बनना चाहती हूँ,
तुमसा बनना चाहती हूँ।
मेरी माँ, प्यारी माँ.

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