Old Memories Poem – बेचैन कर जाती जब ये शामें – Life Poetry

Old Memories Poem – Life Poetry

Old Memories Poem

बेचैन कर जाती जब ये शामें हद से ज्यादा,
डसने लगती है जब तन्हाई बेशुमार,
तन्हा कर जाते है ये घरोंदों में लौटते पंछी,
सूना आकाश, ये मौन खड़े दरख़्त,
डराने लगती है इनकी खामोशिया,
ये चाँद जो झांक कर,
मुझ पर हँसता है,
उबर आते है दिल के छाले,
टीस उठाती है, चांदनी की शीतलता,
उलझ के रह जाती हूं फिर,
तेरी यादो के चक्रव्यूह में,
तब, ही झटक के उतार फेंकती हूँ
तेरी यादो की चादर,
उठ खड़ी होती हूँ,
निकल जाती हूँ,
दूर बहुत दूर, उन अंजान रास्तो पर,
ये कदम खुद ब खुद लिये जाते है
बिना पूछे मुझसे, उस जगह,
जहाँ न कोई जानता हो, न पहचानता हो,

न कोशिश करे, चेहरे के भाव पढ़ने के कोई,
चलती जाती हूं निरंतर दिशाहीन,
ले जाते है ये कदम
एक वीरान खँडहर के पास,
जो एक पौराणिक जीर्ण शीर्ण सा मंदिर है,
सुना है रास रचाया करते थे राधा कृष्ण यहाँ,
आज खड़ी हूँ उसी मंदिर के आगे,
शब्द नहीं है, बस अश्रु की धार बह रही है लगातार,
बड़ी देर निहारती रही निर्विकार,
लगा यूँ की राधा मुस्कुराई
कान में यूँ फुसफुसाई,
बोली चुप हो जा पगली कि क्यों रोती है,
कहाँ मिल पाई थी मैं भी,
तो तू कौन होती है
देख न जाने कितनी सदियों से,
युगों युगों से मैं ही खड़ी हूँ कान्हा के साथ।
जा पोछ ये आंसू, उसकी वो जाने ,
तू तो उनके ही दिल में रहती है।
बस मुस्कुराई मैं भी, अब था शांत तन-मन
मुस्कुरा रहे थे चाँद तारे, बहने लगी थी शीतल पवन,
जो उड़ा के ले आई अपने संग,
पाया तो घर में राधा कृष्ण की
प्रतिमा पर दीपक जलाए खड़ी थी।

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