Tea Time Poem – मैं और मेरा चाय का कप – Poem on Memory

Tea Time Poem – Poem on Memory

Tea Time Poem

मैं और मेरा चाय का कप
देख ले थाम मेरी ऊँगली,
आज फिर एक बार लौट आई हूं मैं तेरे पास,
अर्सा हुआ न बैठी सुकून से,
आज हूँ शांत, कोई बेचेनी नहीं,
कोई शिकवा नहीं शिकायत नहीं।
हां, मत देख मुझे इन सवालिया नजरो से,
आज भी नहीं है कोई उत्तर मेरे पास।

पता तो है तुझे, जब खुद से
नजरे चुराती हूँ, तब सिर्फ तेरे पास आती हूँ,
नहीं है सामर्थ्य, कि तुझसे नजरे मिलाऊँ,
न देख, मेरी आँखों में यूँ बार बार,
बड़ी मुश्किल से रोका है इन्हें,
बेताब है आँखों से छलक जाने को,
सीख लिया है पलकों से वापस भीतर ले जाने का हुनर।

न जाने कब से तेरे साथ नहीं बिताये कुछ एकांत के पल।
याद है किस तरह, बिता देती थी घंटो का समय, तुझे थामे इन हाथो में।
ले आ, थाम ले मेरा हाथ,
कुछ नहीं चाहिये, बस बैठ मेरे साथ।
आ एक बार फिर लगा लू होठो से तुझे मैं,
घूट घूट उतर गले के रास्ते,
मिटा दे ह्रदय की आग।
जब हर तरफ से थक जाती हूँ
पता तो है तुझे तब सिर्फ तेरे पास आती हूँ।

अरे नहीं मत मिटा ये निशान,
आँखों से ये गालो तक खिंची रेखा है,
तेरे अलावा इन्हें कहा किसी ने देखा है,
रहने दे कुछ देर इन्हें यूँ ही,
ये ही तो है मुझे, तुझ तक वापस खीच लाने का रास्ता,
बस अब कुछ और न पूछ,कुछ न कह, तुझे इन्ही का है वास्ता,
आज फिर, एक बार सिर्फ मै और मेरा प्यारा चाय का कप।

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