Teenagers Poem – मैं चली इतराती इठलाती – Love Poem Hindi

Teenagers Poem – Love Poem Hindi

Teenagers Poem

लो, मैं चली इतराती इठलाती,
बलखाती मदमस्त अपनी ही,
धुन में, सागर में समाने को,
हाँ भूल अपना अस्तित्व,
पूरी तरह उसमे घुल जाने को,
हाँ वो भी तो है उतना ही,
बेक़रार, विशाल बाहे फैलाये अपनी मुझको खुद में मिलाने को।

माना कि आसान नहीं है,
दुर्गम बहुत है मार्ग उस तक जाने को,
कहो तो, मैं भी कब रुकी,
इन अवरोधों के रोके,
ना टोक पाए ये पहाड़ी, ये कटीली झाड़ी,
और ये विशालकाय गगनचुम्बी दरख़्त।

उन्हें ठुकराती, उन्हें चीरती, सबको छलती और मनाती,
कंटीली झाड़ियों से खरुचती, चट्टानों से टकराती,
फिर भी मन में वो उत्साह लिये,
मुस्कुराती तेरी ओर निरंतर बढ़ती ही जाती हूँ मैं,
हां मैं नदी, कुछ इतराती, कुछ बलखाती तेरी ओर सनसनाती चली आती हूँ मैं,
छोड़ के अपना देश,
संगी -साथी और परिवेश,
तेरे और सिर्फ तेरे लिये ही तो चली आई हूँ।

हाँ मैं दीवानी, कमली भूल गई अपना ही वेश,
पर न जाने क्यों न दिखती तेरे नैनों में वो पहले वाली प्रीत,
नजर,जो आता है,तेरी आँखों में है कैसा ये दंभ?
बदल गए है तेरे चेहरे के सारे ही भाव,
न जाने कैसे कह दी थी तूने ये बात,
नहीं है अब तुझको,किसी के भी प्रीत की दरकार।

मैं चौकी, मैं लड़खड़ाई मैं सकपकाई,
फिर समझ में तेरी बात ये आई,
तेरे लिये ही तो, इतनी दूर से थी मैं आई,
सबकुछ जानते और बूझते क़ि बहुत सी हैं,
आतुर, उत्तेजित, विकल तुझमे आ, घुल मिल जाने को।

तू है अनंत, विशाल पर,
है न तेरा कोई ओर न छोर,
तब भी न थी मैं हारी और थकी,
न हैं, तू सिर्फ मेरा, है सबका तू,
सब कुछ स्वीकारती, आई हूँ,
तय करती, कोसो, मीलो और कठिनाइयों का रास्ता,
फिर भी प्यार जताने तुझसे ही आई हूँ।

तू निष्ठुर, तू कठोर, तू निर्मोही तू हरजाई,
अब और नहीं सह सकती, तेरी अवहेलना,
पर, रुक, थम, ठहर और सुन,
न उछल, न इतना उफन,
अब नहीं होने दूँगी मैं आत्म सम्मान का अभाव,
सुन, पगले था एक रावण, घोर प्रतापी और बलशाली,
हो गया था उसको भी दम्भ।

एक बानर ने उखाड़ फेका था उसका भी सारा घमंड,
होगा तू असीम अथाह,पर है तू, स्थिर, अचल,
है खारा तेरा अपार भंडार,
जो बुझा न सकेगा तू किसी की एक बूंद भी प्यास,
मैं मीठी हूँ, मैं जीवन हूँ,
है लोग मुझे पूजते, मुझे चूमते उठा,
अंजुली में जल, मेरी कस्मे खाते,
करती हूँ, पूरी जन्म जन्म की उनकी प्यास,
देख, निकल जो बाजू से, मैं तेरे जाऊँगी,
अपना ही सागर मीठे फल का खुद ही बनाऊँगी,
सब नदियों को खुद में ही मिलवाउगी।

गर मोड़ लिया ना, मैंने मुँह तुझसे,
नहीं रह जायेगी तेरी कोई बिसात।
हम ही है, जो अपना अस्तित्व मिटा तुझमे मिल जाती है।
तुझ अपूर्ण को, पूर्ण बनाती है।
छोड़ ये अब, गीले रंजिश की बाते
तेरा आस्तित्व है जो, उसे न मिटने दूँगी।
तू अपनी हद पहचान,
मेरी तो नियति ही हैं तुझसे मिलना,
तो तुझमे ही मिल जाऊँगी।

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