Terrorism poem – कैसे रच दूँ – Fear of Terrorism

Terrorism poem – Fear of Terrorism

Terrorism poem

कैसे रच दूँ, मैं कोई प्रेम गीत
प्रिय कैसे करूँ मैं तुमसे प्रीत,
नहीं भुला पा रही, रुन्दन,
वो हाहाकार, वो चीख पुकार,
नहीं भूल पा रही हूँ वो बिलखते बच्चे,
जो ढूढ़ रहे अपने माँ बाप,
कही पड़ी फटी अटैची,
तो कही बिखरे है खून सने कपड़े,
पड़ा था कही एक हाथ,
तो गिरा था कही किसी का पैर।

घूम जाती है आँखों के सामने बिलखती वो लड़की बार बार,
जो कह है थी, भाई बहन तो मिल गए, पापा नही मिल पा रहे।
हर सने चेहरे में पापा को खोजती उसकी चोटिल आँख,
हाय कैसे जायेगी वो घर, बिना पापा को लिये साथ,
क्या बतलायेगी, कैसे मुह दिखाएगी जा माँ को।

गए थे तो सब साथ,
फिर कैसे छोड़ दिया उसने पापा का हाथ,
न जाने कैसे चलेगा बिना आधार के उसका परिवार,
नहीं रोक पा रही हूं मैं ये अश्रु धार,
न जाने कहाँ गया वो भाई,
जो बहन के घर जा रहा था,
लेकर शादी की बधाई,
ले कर चला था कितने, गहने कपडे और मिठाई,
कितना कोसती होगी खुद को वो बहन बिचारी,
न आता, ले कर वो बधाई,
तो शायद ये न होता।
नहीं बोल पा रही थी,
वो अस्पताल में घायल पड़ी महिला,
कहा था उसने कि जब,
उसने अपनी आँख खोली, तभी पति की आँख बंद हो गई।

बिलख रही थी वो बिचारी, काश उसने भी न खोली होती आँख,
क्यों बच गई वो अभागी
उसका रोना बिलखना, अब तक गूंज रहा है कानो में,
आधी फसी वो मेडिकल की छात्रा,
घण्टो फसी रही, इस आस में, शायद कोई बचा ले,
बार बार वो सबको फोन पे समझाती,
अपनी स्थिती बताती,
पर न बच पाई वो बिचारी,
जिसका था सपना, बन डॉक्टर कितनो को बचाएगी,
क्या पता था ,वह एक दिन खुद सपना बन जायेगी।

जा रहा था वो टेलर, अपने घर,
लेकर के घर वालो के लिये सपने हजार,
न पहुच पाया वो, घर बिचारा,
करता रहा इन्तजार उसका परिवार सारा,
खो दिया उन्होंने वो एकमात्र मुखिया,
जो उठता था बोझ सारा,
वही तो यह अपने परिवार का एक मात्र सहारा,
कौंन देगा उनको अब निवाला।
नहीं रहा वो सैनिक भी,
जो ख़ुशी ख़ुशी जा रहा था अपने घर,
मिली थी छुट्टी उसे भी मुश्किल से बड़ी,
कहाँ पता था कि छुट्टियों पे घर न पहुच पायेगा,
बीच में ही बड़ी छुट्टी पे चला जायेगा।

अब उसके परिवार को कौन समझायेगा।
ये मुआवजा, क्या कोई भरपाई कर पायेगा।
ह्रदय में बड़ा ही है संताप
न जाने ऐसा क्यों लग रहा है कि मुझसे ही हो गया है कोई पाप।
चाह के भी कुछ न कर पाऊँगी,
बस बेबस, रो रो के चुप हो जाऊँगी।

पर देख,के आती इतनी घिन, संसद भवन के नेताओ की राजनीति,
नहीं अफ़सोस इन्हें लेश मात्र भी,
नहीं चूकते करने से ये मौका परस्त अपनी राजनीति,
भुला देगा कुछ ही दिनों में ये संसार,
फिर सुबह होगी, चल पड़ेगा मानव,
अपनी, रोटी पानी की अंतहीन यात्रा पे,
यही नियति है, यही चलन है,
बंद कर देती हूं घबरा के समाचार,
नहीं देखा जाता, और अब ये आत्याचार,
अब बोलो कैसे मैं खुद को भरमाऊ,
प्रिय कैसे प्रेम गीत मैं कोई गाऊ।

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