Truth Poem – सत्य की खोज – Seeker of Truth Poem

Truth Poem – Seeker of Truth Poem

Truth Poem

सोचा न था, एक सुबह यूं भी आएगी,
हर सवेरा देता था,
जीवन के आगे बढ़ने का संदेश..
हर भोर कर जाती थी मुझे भाव विभोर,
हर रात बुनती थी हजारो स्वप्न,
उन स्वप्नो को यथार्थ में परिवर्तन होते देखने की लालसा ने कभी न ले पाई गहन निंद्रा,
जानते हो क्यों? नहीं ना?
भयभीत रहती थी कही उस गहन निंद्रा में कोई स्वप्न न फिसल जाए मस्तिष्क से,
तुमसे क्या बता रही हूँ,
अपने ह्रदय की व्यथा..
कहॉ पहचान पाई थी तुम्हें,
कहॉ जान पाई तुम्हारे मन के कोलाहल को,
काश की देख पाती तुम्हारी उस दुनियॉ को जिसमें तुम जी रहे थे…
स्त्री हूँ ननहीं सिखाया गया कुछ और,

पति परमेश्वर होता है,
उसका घर परिवार स्वर्ग सा सुंदर बनाना है,
अपने आचरण और कर्तव्य से,
बस यही सिखा पाये थे, माता_पिता..
उनकी इस सीख को गॉठ बॉध के ही स्वर्ग सा सजाने चली थी अपने इस संसार को,
कहॉ पता था तब मेरे मंदिर का देवता विचलित है,
इस संसार को छोड़, नये सत्य_संसार की खोज मेे है,

मेरे तो सत्य भी तुम, संसार भी तुम, स्वप्न भी तुम यथार्थ भी तुम,
स्त्री थी स्त्रित्व निभाना जानती थी वही कर पाई..
नहीं देख पाई तुम्हारे मन की परतो के नीचे किस सच के खोज की चाह है,
कहॉ था इतना भान मुझ मूढ़ को,
मेरा सत्य तो तुम और सिर्फ तुम थे और अपना पुत्र राहुल,
जिसे मैं हम दोनो के प्रेम का प्रतीक समझ बैठी थी,
मैं अभागी इसी इसी भ्रम मे
जीये चली जा रही थी,
मेरा तो मोक्ष तुम्हारी
तन_मन से सेवा तक ही था..
किस शांती, सत्य, और मोक्ष की खोज ने तुम्हे इतना स्वार्थी बना दिया कि
तुम्हारे बाद हमारा क्या होगा
ये सुध भी न आई तुम्हे?

देखा था
काली रात का अंधेरा,
मेरे लिये तो उस रात के बाद का
सवेरा और काला, गहराता चला गया,
आज भी उस काली_अंधेरी सुबह की दीवारों,से टकरा के
गिर जाया करती हूँ हमेशा…,
रिसता है आज भी रक्त इनसे,
नासूर बन ,मन बार बार यही
प्रश्न करता है,क्यो गये यूँ चोरी से,
क्यो सोता छोड़ गए,कर गए अकेला हमेशा_हमेशा के लिए…
बस एक बार तो कह के देखते,
जगा जाते, बता जाते तुम उद्देश्य जाने का,
सच कहती हूँ, ना रोकती, ना टोकती तुम्हें, ना बॉधती तुम्हें
मोह माया के जाल में,
रख छाती पर पत्थर विदा करती, एक योद्धा की भांति,
देख लेती जी, भर_भर के तुम्हें,
आशीष दिला, राहुल को गौरव करती खुद पर..

हाय, पर एेसा न हो सका,
विश्वास न जीत पाई ये अभागन तुम्हारा,
उफ् नहीं देख पाती हूँ ये ऑखे राहुल की..
न जाने कितने सवाल करती है ये?
उसकी चितवन सिर्फ और सिर्फ तुम्हें ढ़ूढ़ती हैं,
मेरे पास उसकी किसी चितवन का,
किसी प्रश्न का कोई उत्तर नहीं है,
है तो सिर्फ मौन पतराई आँखे और एक विशाल शून्य,
जिसमे भटकती मैं,
विचारों के इस चक्रव्यूह का ओर_छोर ढू़ढ़ती अकेली मै,

खुद में ही कहीं दोष ढ़ूढती हूँ….
क्या जानो तुम किसी त्यजित नारि की पीर,
सबकी नजर ही बदल गई एक रात में,
सबको हजारों खोट दिखने लगे हैं मुझमें,
कल तक जो नजरें सम्मान
देती थीं अब उपहास,घृणा दोष दिखता है मुझमे उन्हें,
मेरा मान, सम्मान, अभिमान
सब तुम्हारे साथ ही चला गया…..
रह गया है तो बस मातृत्व
और कई सारे सवाल,
महानता की परिभाषा ढूंढती,
सत्य और मोक्ष के इंतजार मे भटकती मैं…

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