Women Empowerment Poem – हाँ देश बदल रहा है – Hindi Poem

Women Empowerment Poem – Hindi Poem

Women Empowerment Poem

हाँ देश बदल रहा है,
थोड़ा थोड़ा परिवेश बदल रहा है।
तुमसे या हमसे ही तो नहीं बदल पायेगा।
आप,वो बदलोगे तो ही धीरे, धीरे बदल पायेगा
न जाने वो दिन कब आएगा,
इंसान ही इंसान को बेचना बंद कर पायेगा।
बड़ा पढ़ लिख कर आगे बढ़ गया है युवा,
न जाने अब वो कब वयस्क कहलायेगा।
हर फैसला तो खुद ही कर लेता है ये युवक,
पढाई की हो,या कॅरिअर की हो फिल्ड
बुद्धिजीवी है, ये जताने से कभी नहीं कतराता है।
सोसियल मीडिया की साइट हो,
या हो फ़ेसबुक और ट्विटर,
देखो कैसे चलती है इनकी उंगलिया खटर-खटर।
खूब डेट पे जाते और बतियाते है,
अपने आप को एकदम मोर्डन कहलाते है.

पर जब आती है घर बसाने की बात,
होनी शुरू हो जाती है शादी
शादी की बात,
न जाने कैसे ये बच्चे बन जाते है,
तजुर्बे में कच्चे कहलवाते है,
तब खुद का कोई फैसला कहाँ कर पाते है,
एकदम माँ बाप पे निर्भर हो जाते है,
या यूँ कह लो, बुजुर्गो के कंधे पे रख के बंदूक ये चलाते है,
एकदम से संस्कारी और पारंपरिक हो जाते है,
खो गई थी संस्कृति और परंपरा,
जब लड़की को ले गए थे,
लौंग ड्राइव पर तब तो माँ बाप की अनुमति नहीं आये थे ले कर,
अब लालच ने उन्हें भी भरमाया है.

महंगी गाडी, केश और कीमती सामान के मोह ने उन्हें भी आ घेरा है,
खो जाती है, ऊँची शिक्षा, ओहदा और ईमान,
बन जाता है सिर्फ वो बेईमान।
जितना बड़ा ओहदा,
उतनी ही लगती है ऊँची बोली,
शायद अब भी उतना सक्षम नहीं हुआ ,की जुटा सके ,आपने जीने का सामान।
खो देते है अपना आत्म सम्मान।
मत इतराओ लड़कियों,
तुम भी कुछ कम नहीं हो,
क्यों पढ़ाया लिखाया और काबिल बनाया है,
तुम भी तो इंजीनियर, डॉक्टर, आई, ए, एस और डिजाइनर हो,
अकेले स्कूल, कॉलेज और नॉकरी पे जाती हो,
अब उतना तो तुम भी कमाती हो,
और निपताती हो सारे घर बहार के काम,
जा अंतरिक्ष और ओलंपिक में मेडल लाती हो।
फिर शादी की बात में क्यों एकदम से अबला बन जाती हो.

जितनी जरुरत तुम्हे उनकी है,
उतनी ही जरुरत है उन्हें तुम्हारी।
फिर कैसी है ये लाचारी,
तुम्हे भी तो सिखाया था आत्म सुरक्षा के लिये कराटे,
न जाने कितनी बार जीते है वाद विवाद में इनाम ये सारे
इन इनामो से न शोकेश सजाओ,
अब तो बाहर निकलो सामने आओ,
कह दो चिल्ला के नहीं है तुमको इस छलावे में आना
जब पूरे मर्द बन जाओ तब ब्याहने आना,
नहीं बहाने दूँगी पिता की खून पसीने की कमाई,
जितने काबिल तुम हो उस से ज्यादा सक्षम हूँ मैं,
गर हो जरुरत जीवन संगनी की,
तो छोड़ लालच, लोभ दम्भ तुम मेरे घर आना,
ख़ुशी ख़ुशी साथ चलूँगी और पूरा सम्मान पाना।
तब कहूँगी गर्व से मै ,
हां देश बदला है परिवेश बदला है हमने भी।

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