Tag: Human Poetry

Human Being Poem – परवरदिगार निकला – Hindi poem on Humanity

Human Being Poem – Hindi poem on Humanity Human Being Poem आया था बन के तूफ़ाँ लेकिन ग़ुबार निकला कुछ ऐसा दिलफ़रेब सा अपना प्यार निकला कश्ती किया हवाले जिसे नाख़ुदा समझ कर वो शख़्स समन्दर की लहरों का यार निकला. हमने रखी बचाकर थी दिल में जिसकी पूँजी दौलत नही थी अपनी वह तो

Human Poem – पहचान हो तो बताना – Hindi language Poem

Human Poem – Hindi language Poem Human Poem एक टुकड़ा भी गैरों को खिला कर देखो, ये ख़ुशी क्या है, पैसों को हटा कर देखो। तुझको दौलत की आरज़ू ने खरीदा है, प्यार की खुशबू को होंठों से लगा कर देखो। हर ज़ुबाँ पर तो नफ़रत के ही किस्से है, अपने ही दिल में मुहब्बत

Humanity Poem – कुछ आग सी है – Poem in Hindi language

Humanity Poem – Poem in Hindi language Humanity Poem कुछ आग सी है मेरे शहर के लोगों में, खुन्नस सी भरी देखी है घर के लोगों में। कुछ दर्द तो बाकी रहा होगा उधर कहीं, जो दर्द आज भी है इधर के लोगों में। उतना नशा नहीं रखते हैं शब के लोग, जितना नशा होता

Humanity Poem – कोई तीखा सा पकवान हो तो – Tell Me a Poem

Humanity Poem – Tell Me a Poem Humanity Poem कोई तीखा सा पकवान हो तो बताना, कभी तुम्हारे यहां जलपान हो तो बताना। आदमी आदमी का यहां कातिल है, आदमियत से कोई अनजान हो तो बताना। ऐ मेरे मालिक मैं तेरे जिस्म का टुकड़ा हूँ, मेरी अपनी कोई पहचान हो तो बताना। अपने ही घर,

Human Nature Poem – क्या जानना नहीं चाहोगे – Hindi Kavita

Human Nature Poem – Poem on Human and Nature Human Nature Poem क्या जानना नहीं चाहोगे? मैं कहाँ, किस हाल में हूँ, जीवित भी हूँ या फिर मर-खप गई हूँ। शायद तुम नहीं जानना चाहोगे। तुम तो पुरुष रूप में जन्म पाकर लिप्त हो मौके-बेमौके अपनी पौरुषता के एकाकी स्वांग रचने में। ओ पुरुष, मगर

Poem Human Life – मेहरबानी – Poem on Humanity in Hindi

Poem Human Life – Poem on Humanity in Hindi Poem Human Life वाह रे इंसान! तेरी गज़ब की मेहरबानी है…… अब हो रही बच्ची तक की क़ुर्बानी है वाह रे इंसान! तेरी गज़ब की मेहरबानी है ….. भाई के चेहरे में छिपा हुआ हरामी है वाह रे इंसान! तेरी गज़ब की मेहरबानी है ….. यह

Human Life Poem – यदि पत्थर दिल इंसान न होते – Human Life

Human Life Poem Human Life Poem यदि पत्थर दिल इंसान न होते, फिर यहां सभी चैन की नींद में सोते। कितने बैठे भेड़िये ओढ़कर दुशाला, जो जीवन भर कांटे ही बोते। कितनों की नहीं पहुचे चीख न्याय के घर में, देखे कितने मंहगे वकील सत्य को ही खोते। है बडिया वकील देख वही यहां पर,