Tag: Memories Poetry

Diary Poem – डायरी के पृष्ठ – Memories Poem

Diary Poem – Memories Poem Diary Poem कुछ पुराने पन्ने कुछ पुरानी इबारतें कुछ पुरानी यादें  कुछ पुरानी शरारतें झाँकता है पन्नों की सतह से व्यतीत बन गया कितना कुछ चुपके से अतीत शब्दों की दास्ताँ भी कितनी अज़ीब है दूर होकर भी कोई इतना क़रीब है

Memories Tree – यादों का पौधा – Poem on Life in Hindi

Memories Tree – Poem on Life in Hindi Memories Tree तुम्हारी दी हुई चीजों को, मैंने दफ़न कर दिया था, ज़मीन के नीचे, कि जैसे दफन करते हैं एक लाश को, उस के मर जाने के बाद। मैंने सोचा कि ये चीज़े भी मर जाएंगी, जैसे हमारा रिश्ता मर गया, मगर मालूम न था, ये

Sweet Memories Poem – सुबह से रात होने को – Hindi Poem

Sweet Memories Poem – Hindi Poem Sweet Memories Poem सुबह से रात होने को आई है मगर तुम्हारी यादें है कि वापिस घर जाने का नाम नहीं लेती अभी तक मेरे सिरहाने में पड़ी हैं, ना जाने इन्हें कैसे खबर हो गई कि मैं कब से भूखा हूँ, तुम्हारी यादें मुझसे कहती हैं कि मेरे

Tea Time Poem – मैं और मेरा चाय का कप – Poem on Memory

Tea Time Poem – Poem on Memory Tea Time Poem मैं और मेरा चाय का कप देख ले थाम मेरी ऊँगली, आज फिर एक बार लौट आई हूं मैं तेरे पास, अर्सा हुआ न बैठी सुकून से, आज हूँ शांत, कोई बेचेनी नहीं, कोई शिकवा नहीं शिकायत नहीं। हां, मत देख मुझे इन सवालिया नजरो

Old Memories Poem – बेचैन कर जाती जब ये शामें – Life Poetry

Old Memories Poem – Life Poetry Old Memories Poem बेचैन कर जाती जब ये शामें हद से ज्यादा, डसने लगती है जब तन्हाई बेशुमार, तन्हा कर जाते है ये घरोंदों में लौटते पंछी, सूना आकाश, ये मौन खड़े दरख़्त, डराने लगती है इनकी खामोशिया, ये चाँद जो झांक कर, मुझ पर हँसता है, उबर आते

Tea Time Poem – चाय का कप और तुम्हारी यादें – Memories Poetry

Tea Time Poem – Memories Poetry Tea Time Poem मैं, पहला चाय का कप और तुम्हारी यादें, सब कुछ तो वैसा ही है, न जाने क्यो, आजकल ये कप कुछ रूठा_रूठा सा फिर रहा है, मुंह फुलाया सा, कुछ अनमना सा, शिकायत भरी नजरों से, नजरे चुराता हुआ सा, चाहता है, मैं जान भी लूं,

पुरानी यादें – Memories Poem – Poem on Life in Hindi

पुरानी यादें – Memories Poem पुरानी यादें, वो भी क्या दिन थे, न कोई चिंता, न कोई फ़िक्र थी, अपनी ही मस्ती में, हम मशगूल थे, न घर परिवार की, न क़ुदरत की मार की, कोई फ़िक्र हमको न सालती, अपनी मस्ती में, हम मगरूर थे, ऩ कोई अमीर था, न कोई गरीब था, अपने