Take Time Poem – अब सौ बटा सौ – Dare To Be Poem

Take Time Poem – Dare To Be Poem

Take Time Poem

अब और नही आधा, पौना,
तीन चौथियाई, या दो तिहाई।
अब तो बस, सौ बटा सौ।

जीती हूँ एकदम पूरा,
हँसती हूँ, जोर जोर से,
ठहाके लगा लगा के,

नही छुपाती अब आँसू,
आ जाते है जोआँखों मे,
पढ़ते या देखते फ़िल्म, सीरियल छोड़ दिया,
तकना चोरी से,
कि “ये” या “वो” क्या सोचेगा?
रो लेती हूँ अब खूब खुल के।

नही करती अब मलाल
अपने मोटापे और चौड़ी कमर का,
कभी शोर्ट्स, स्कर्ट, वनपीस तो कभी पहन साड़ी,
खूब इठलाती, इतराती हूं।

न झेंपती हूँ अब,
गिरने से दुपट्टा,
या सरकने से पल्ला,
नही परवाह है अब
किसी की भी घूरती,
निग़ाहों की,
जो है, सो है,
बढ़ जाती हूँ आगे।

क्योकि अब और नही,
आधा पौना…. सौ बटा सौ।

उमड़े गर प्यार तो जता
देती हूँ अब झट से,
नही करती भेद अब
उम्र और लिंग का,
बढ़ आगे गले लगती हूं।
क्योंकि नही आधा, पौना
अब…तो..सौ बटा सौ।

पार्टियों में खूब खुल के
नाचती कूदती हूँ,
बेताला, आनन फानन।
बेसुरा पर, ज़ोर से गाती हूँ,
नही करती परवाह कि,
हँसेगा कोई,
अब खुद पर हँस लेती हूँ,
क्योंकि अब और …नही…आधा पौना
अब.तो …..बस….. सौ बटा सौ।

हां फूंकी थी उस दिन सिगरेट भी,
चाय की चुस्कियों संग दुकान पर।

पी थी वोडका, संग सहेलियों के,
दोनों, लगी कड़वी, कसैली,
किंतु किया, हाँ, जो मन मे आया।

क्योकि अब….नही……
आधा पौना अब तो……सौ बटा सौ।

क्योंकि
देखती हूँ हर रोज अपनी सास को,
जूझते, लड़ते पकड़ते,
हर एक साँस के टुकड़े को,
जैसे हर एक साँस के साथ,
जी लेना चाहती हैं एक पूरा जीवन।

ले जाती हूँ जब उन्हें पकड़ हाथ,
कदम दर कदम बाथरूम,
तो, जैसे लाँघ जाना चाहती है वो,
हर कदम के साथ एक पूरा जीवन.

उनींदी, आस भरी निगाहों से,
देखती है मुझे ऐसे कि कह रही हो
बाकी है देखनी और अभी,
ये। रंग बिरंगी दुनियाँ।

जान जाती हूँ, पहचान जाती हूँ,
उनकी जीभ की चटपटी मांग।

नहलाते वक़्त नही दिखती कोई
स्त्री पुरुष उनमे, बस दिखती हैं,
पंचतत्व रचित काया जिसे चाहिए
कुछ और पल, मिनट, घण्टे, दिन और कुछ साँसे उधार।

तब होती हूँ मैं, आधा पौना नही,
सौ बटा सौ सेवारत बहू उनकी।

हाँ, बस इसलिये ही,
नाप लेना चाहती हूँ,
बाँध पैरों में लंबी बल्लियाँ,
लंबे लंबे डग से सारा संसार।

बस अब और नही, आधा, पौना,
तीन चौथियाई या दो तिहाई,
अब तो सौ बटा सौ।


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